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सचिवालय की मुट्ठी में आवंटन अधिकार, गांवों में छाया है अंधकार

झारखंड में केरोसिन वितरण के नाम पर हर माह खेल हो रहा है। राज्य के आम उपभोक्ताओं को केरोसिन मिले न मिले, लेकिन डिस्ट्रीब्यूटर और अफसर हर माह लाभान्वित हो रहे हैं। दूसरे राज्यों में केरोसिन आवंटन और वितरण का काम जिला प्रशासन के अधीन है, लेकिन झारखंड में विचित्र व्यवस्था यह है कि यहां गांवों में बंटनेवाले केरोसिन के अलॉटमेंट का अधिकार सचिवालय ने अपने पास केंद्रित रखा है। सचिवालय के स्तर पर आवंटन के बाद गांव के जरूरतमंदों तक पहुंचते-पहुंचते केरोसिन हवा हो जाता है।

आपूर्ति विभाग के तत्कालीन मंत्री कमलेश सिंह ने केरोसिन के डिस्ट्रीब्यूशन का अधिकार जिलों से वापस लेते हुए सचिवालय में रख लिया। कुछ दिनों तक सालाना आबंटन जारी होता रहा। इसके बाद तीन माह के लिए आबंटन दिया जाने लगा, परंतु अब तो हर माह आबंटन जारी होता है।राज्य की आबादी लगभग 2.90 करोड़ है और केंद्र से राज्य को प्रति माह 2.26 करोड़ 90 हजार लीटर केरोसिन का आवंटन निर्धारित है। केवल रांची अनुभाजन को 7.60 लीटर और रांची ग्रामीण को 15.12 लाख लीटर केरोसिन की आपूर्ति की जा रही है।

डीलर उसका उठाव 9.09 रुपये करता है और जनता को उसे 9.20 रुपये प्रति लीटर देता है। परंतु इसका सीधा फायदा डिस्ट्रीब्यूटर उठाते हैं। डीलरों का आरोप है कि उनसे प्रति ड्रम 15 लीटर की कटौती की जाती है। साथ ही 9.09 रुपये की जगह उनसे 9.75 रुपये लिये जाते हैं, जबकि रसीद 9.09 रुपये की ही दी जाती है। इसी तरह हॉकर इसका उठाव 9.09 रुपये करता है। उसे 10.20 रुपये प्रति लीटर की दर से बिक्री करनी है, पर पूरे राज्य में इसकी बिक्री धड़ल्ले से 20.24 रुपये प्रति लीटर हो रही है। यह क्रम बदस्तूर जारी है।

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  • Web Title:कौन पी रहा है गरीबों का केरोसिन?