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विनायक की विधायक भूमिका

डॉ. विनायक सेन की रिहाई से हमने राहत की सांस ली है। सुप्रीम कोर्ट के प्रति हमारा शीश श्रद्धा से नत हो गया है। इसके पहले डॉ. सेन की रिहाई का छत्तीसगढ़ सरकार ने इतना तीव्र प्रतिवाद किया था कि सर्वोच्च अदालत ने दिसम्बर 2007 में डॉ. सेन की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने एक पंक्ित का फैसला सुनाया था।

इस बार इसी अदालत ने डॉ. सेन की रिहाई का आदेश देने में एक मिनट का भी समय नहीं लगाया। पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी डॉ. सेन की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। देशभर के बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार संगठन दो साल से डॉ. विनायक सेन की रिहाई के लिए लड़ रहे थे। अकेले बंगाल में हम लेखकों, कलाकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने बार-बार जुलूस निकाले। कई मर्तबा जनसभाएं कीं। कोलकाता ही नहीं, रायपुर से लेकर दिल्ली तक के बुद्धिजीवी डॉ. सेन की रिहाई के समर्थन में लड़ रहे थे। इसी के समानांतर कानूनी लड़ाई भी लड़ी ज रही थी।

 विनायक सेन अब घर आ चुके हैं। दोनों बेटियों के पास। विद्वान पत्नी डॉ. इलिना सेन के पास। मां अनुसूइया सेन के पास। रायपुर के अपने आदिवासियों के पास। लेकिन अपनों के बीच आते ही वे पुन: तुरंत अपने सेवा कार्य नहीं प्रारंभ कर पा रहे हैं। क्योंकि दो वर्ष तक जेल के सीखचों के भीतर उन्हें इतनी यंत्रणाएं सहनी पड़ी हैं कि वे अनेक शारीरिक व्याधियों के शिकार हो गए हैं। उनकी चिकित्सा चल रही है।

डॉ. सेन को गत दो वर्षो के दौरान जो यातना दी गई, उसके लिए छत्तीसगढ़ सरकार की जितनी भत्र्सना की जए, कम है। भाजपा के राज का आशय तालिबानी शासन है, इसका एक सबूत गुजरात में नरेन्द्र मोदी अल्पसंख्यकों के खिलाफ एकतरफा नरसंहार अभियान चला कर दे चुके हैं तो दूसरा सबूत छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार ने डॉ. सेन की गिरफ्तारी से दिया था। रमन सिंह ने उस विनायक को नाहक गिरफ्तार करने की बेशर्मी दिखाई थी जिसने छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को गरीबी और कुपोषण से मुक्त करने की दिशा में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए।

डॉ. सेन 25 वर्षो से आदिवासियों की नि:स्वार्थ सेवा कर रहे हैं। उनकी इस रजत भूमिका का सम्मान देश-विदेश की कई प्रतिष्ठित संस्थाओं ने किया। उन्हें पाल हरिसन अवार्ड, आर. आर. खेतान स्वर्ण पदक और 140 देशों की अंतर्राष्ट्रीय ज्यूरी द्वारा स्वास्थ्य व मानवाधिकारों के लिए चयनित जोनेथम मन अवार्ड से सम्मानित किया गया था। पर छत्तीसगढ़ सरकार ने उन्हें सम्मानित करने के बजए उन पर माओवादी होने का आरोप लगाया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

रमन सिंह सरकार ने अपने आरोप के समर्थन में जो तथ्य दिया था, वह इस प्रकार है- रायपुर के न्यू सम्राट टाकीज के पास पुलिस ने गहन तलाशी अभियान के दौरान पीयूष गुहा नामक व्यक्ित को गिरफ्तार किया। उसके पास से तीन पत्रिकाएं और तीन पत्र बरामद हुए। इन पत्रों में दो अंग्रेजी में लिखे थे और एक बांग्ला में। पूछताछ के दौरान पीयूष गुहा ने पुलिस को बताया कि ये पत्र उसे डॉ. विनायक सेन से मिले थे और सेन ने ये पत्र रायपुर सेंट्रल जेल में कैद माओवादी नारायण सान्याल से प्राप्त किए थे।

माओवादियों के पत्र पहुंचाने के आरोप में छत्तीसगढ़ पुलिस ने डॉ. सेन को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद 19-05-2007 को उनके घर की हुई तलाशी के दौरान गेर कानूनी संगठन (माओवादी) के सदस्यों द्वारा लिखे गए पत्र, आपत्तिजनक साहित्य, एक कंप्यूटर सीपीयू और आठ कंपैक्ट्स डिस्क बरामद किए गए।

उन्हें आतंकवाद विरोधी कानून के तहत सह अभियुक्त बनाया गया और कहा गया कि जेल में कैद सीपीआई (माओवादी) के सदस्य नारायण सान्याल से विनायक सेन ने तैंतीस बार मुलाकात की। पत्र पहुंचाने के जरिए माओवादियों की मदद कर विनायक सेन ने करोड़ों रुपए के जन-माल का नुकसान किया।

छत्तीसगढ़ सरकार ने यह भी आरोप लगाया कि डॉ. सेन ने नारायण सान्याल को 2005 में रायपुर में भाड़े का घर दिलाने में मदद की थी। डॉ. सेन का नाम नक्सल प्रभावित दांवेवाड़ा और राजनंदगांव जिलों में बरामद नक्सल दस्तावेजों में भी पाया गया है।

हालांकि नारायण सान्याल से जेल में डॉ सेन ने मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल पदाधिकारी के नाते भेंट की थी। किसी बरामद कागजत से डॉ. विनायक सेन के माओवादी संगठन से सम्बद्ध होने का पता नहीं चलता। सान्याल की तरफ से डॉ सेन को भेजे गए किसी पत्र का भी कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। पीयूसीएल के मेरे साथियों ने बताया था कि डॉ. विनायक सेन द्वारा सलवा जुड़म की आलोचना किए जाने और छत्तीसगढ़ के 640 गांवों के लोगों के विस्थापन का तीव्र विरोध किए जने से वहां की सरकार बेहद नाराज थी, इसलिए भी उन्हें सबक सिखाया गया।

रमन सरकार ने कहा है कि विनायक नामभर के डॉक्टर हैं। मुङो यह वक्तव्य समूचे चिकित्सकीय पेशे का अपमान लगता है। इस तरह के अपमान तालिबानी ताकतें ही करती हैं। तालिबानी यातना का जवाब रचना से कैसे दिया ज सकता है, यह सीख हमें विनायक सेन ने दी है।

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