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खबरों में इंसाफ की हड़बड़ी

बीते हफ्ते एक बेटी सुर्खियों में रही जिसने अपनी मां की हत्या कर दी। हत्या की वजह यह बताई गई कि मां ने उसे अपने प्रेमी के साथ ‘आपत्तिजनक अवस्था’ में देख लिया था। बेटी ने पुलिस के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। एक पढ़ी-लिखी, स्कूल में पढ़ाने वाली लड़की सिर्फ इसलिए मां को मार डाले कि उसे उसके प्रेमी के घर आने-जाने पर एतराज था, यह विचलित करने वाला तथ्य है। इस तथ्य में सिर्फ लड़की के व्यवहार पर नहीं, हमारे समय और समाज पर भी टिप्पणी छुपी हुई है।

लेकिन जिन अखबारों में- और लगभग सभी अखबारों में- प्रमुखता से यह खबर छपी, वहां व्यवहार और समाज से जुड़ा मामला गौण रह गया, लड़की का चरित्र सबके निशाने पर आ गया। एक हद तक इसे स्वाभाविक प्रक्रिया भी मान सकते हैं- आखिर वह बेटी कैसी होगी जो अपने प्रेमी की खातिर अपनी मां का कत्ल कर सकती है? मगर इस स्वाभाविक प्रक्रिया के आगे प्रश्न और भी हैं। सबसे पहले अपनी मां से अपने मन की गुत्थियां खोलने वाली बेटियां अचानक ऐसी क्यों हो रही हैं कि मां अजनबी ही नहीं, ऐसी शत्रु हो जाए जिसकी हत्या कर दी जाए? क्या यह हत्या शराब के नशे में की गई? या लोकलाज का डर इतना बड़ा हो गया कि बेटी ने मां को ही खत्म कर देने का रास्ता चुना? यह प्रेम था या मनोरोग?

ऐसे मामलों की वजहें खोजना या बताना आसान नहीं है। एक तो इसलिए कि जिस लड़की ने यह अपराध किया, उसे हम जानते नहीं हैं। दूसरे, एक हद के बाद यह मामला पुलिस के अलावा अगर किसी का बनता है तो वे मनोविश्लेषक या समाजशास्त्री हो सकते हैं। लेकिन अपने एक जघन्य अपराध से ही एक लड़की जब अकेली मिल जाए तो खुद को पुलिस, समाजशास्त्री, डॉक्टर सब कुछ मानने वाले मीडिया को जैसे एक शिकार मिल जाता है। इस बार भी वही हुआ। अखबार उसके प्रेमियों की संख्या गिनने लगे, इस बात का हिसाब-किताब लगाने लगे कि कब कौन उसके घर आता-जाता था। दरअसल यह मामला इसीलिए इतना बड़ा बना कि इसमें एक लड़की थी, ‘प्रेम प्रसंग’ था, और हत्या थी।

इस लड़की ने जो गुनाह किया है, उसकी सजा उसे मिलेगी। फिलहाल नहीं लगता कि वह कई दूसरे अपराधियों की तरह इतनी मजबूत है कि इंसाफ को खरीद सके या मीडिया को डरा सके। मजबूत लोगों के बारे में फतवे देने से पहले मीडिया डरता है। आधी रात को बीएमडब्ल्यू से कई लोगों को कुचलने वाला हो या एक पार्टी में सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में किसी मासूम लड़की को गोली मारने वाला- वह मीडिया की भाषा में अपराधी नहीं ‘आरोपी’ होता है, क्योंकि वह मीडिया को कानूनी नोटिस भेज सकता है, पैसे की धौंसपट्टी दिखा सकता है।

लेकिन जिस लड़की ने मां का कत्ल किया है, उसके कई गुनाह हैं। मां के कत्ल का गुनाह तो है ही, उसका दूसरा गुनाह यह है कि वह शायद अमीर नहीं है। तीसरा गुनाह यह है कि वह लड़की है। हमारे लिए इतना काफी है। हम उसके कपड़े उतार सकते हैं, उसके प्रेम के निशान और उसके प्रेमी गिन सकते हैं, कचहरी और कानून के बिना उसका इंसाफ कर सकते हैं।

पहली बार नहीं है, जब मीडिया ऐसा इंसाफ करने की हड़बडी दिखा रहा है। सिर्फ कत्ल करने वाली नहीं, कत्ल हो जाने वाली लड़कियां भी उसके इस इंसाफ की बलि चढ़ी हैं। इस मौके पर आनी नहीं चाहिए, लेकिन आरुषि नाम की एक मासूम सी बच्ची याद आती है। अपने घर में ही उसकी हत्या हुई। पुलिस और घरवालों ने नौकर को जिम्मेदार माना। अगले दिन नौकर की भी लाश मिल गई। इसके बाद आने वाले दिन फुसफुसाहटों और कहानियों के हो गए जिन्हें मीडिया रस लेकर सुनाता-बांटता रहा।

आरुषि का मतलब होता है सूर्य की पहली किरण। सिर्फ संयोग है कि जिस लड़की ने अपनी मां को मारा, उसका नाम किरण है। आरुषि और किरण की कहानियां नितांत भिन्न हैं। लेकिन दोनों के साथ मीडिया का सलूक कमोबेश एक जैसा दिख रहा है। यह सलूक बताता है कि जिन खबरों में सेक्स का आयाम दिख जाए, वहां मीडिया को भी बेकाबू होते देर नहीं लगती। अब तक किरण की जो कहानी सामने आई है, उसमें यह आयाम दिखता भी है।

लेकिन आरुषि के मामले में तो अब तक उसकी पुष्टि दूर, उसके पहले प्रमाण भी नहीं मिले हैं। यानी जहां नहीं है, वहां भी यह कोण खोजा जा रहा है। आखिर अखबारों ने आरुषि के फोन कॉल्स और दोस्तों की सूची खंगाली ही थी। किरण के साथ हमदर्दी से पेश आने की जरूरत नहीं है। लेकिन किरण पर पत्थर फेंकने का अतिरिक्त उत्साह भी बेमानी है। क्या ऐसे पत्थर उठाने से पहले मीडिया को एक बार आईने में अपना चेहरा भी नहीं देखना चाहिए?

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