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नई सरकार की चार चुनौतियां

पिछले कुछ हफ्तों में हमने अखबारों के लाखों कॉलम स्थान, टेलीविजन प्राइम टाइम के सैकड़ों घंटे 15वीं लोकसभा के गठन के लिए ही खपा दिए। पार्टियां, उनके गठजोड़, गुटबाजी, नेताओं वगैरह पर चर्चा की। लेकिन अब जब नई सरकार बन गई है तो उसकी नीतियों और चुनौतियों पर सोचने का वक्त है।

चार ऐसे क्षेत्र हैं, जहां इस सरकार को गंभीरता से सोचने की जरूरत है। पहला क्षेत्र है शिक्षा। पिछले कुछ दशक में देश भर के प्राथमिक स्कूलों में भर्ती बढ़ी हैं। यह अच्छी बात है, क्योंकि हमारे लोकतंत्र की बड़ी नाकामी अभी तक यही रही है कि हम अपने सारे नागरिकों को शिक्षित नहीं कर सके।

इस जरूरत को पूरा करने के लिए जो सरकारी और निजी स्कूल हैं, उनकी शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठाए जते रहे हैं। अध्यापक, सुविधाएं, पाठच्य-पुस्तकें सभी में कुछ न कुछ करने की जरूरत है। पहले गरीब से गरीब भी यही सोचता था कि उसका बच्चा बड़ा होकर वही काम करेगा जो वह खुद कर रहा है। अब हर कोई अपने बच्चे को पढ़ाना चाहता है, हो सके तो अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूल में। ताकि उसे ऐसा काम मिल जए जिसमें उसे उनसे ज्यादा पैसे और सम्मान मिले।

प्राथमिक स्कूलों में अगर थोड़ी सी उम्मीद बंधी है तो विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता लगातार घट रही है। इसका कारण एक के बाद एक आए दो शिक्षामंत्री हैं, जिन्होंने संरक्षण और विचारधारा की राजनीति की। पिछले पूरे 11 साल में विश्वविद्यालयों के कुलपति और व्यवसायिक शिक्षा संस्थानों के निदेशक के पदों पर नियुक्ितयां लोगों की बौद्धिक क्षमता के आधार पर नहीं, खास विचारधारा के लोगों के मंत्री से नजदीकी संबंधों के आधार पर हुई।

1998 से 2004 तक भगवा विचारधारा वालों को फायदा मिला तो इसके बाद लाल या गुलाबी विचारधारा वालों को। इस बीच विश्वविद्यालयों के प्रशासन में नौकरशाही का बोलबाला बढ़ा। स्वतंत्र शोध को हतोत्साहित किया गया और पाठच्यक्रम को ज्ञान की दुनिया में हुए बदलावों के हिसाब से शायद ही कहीं रिवाइा किया गया हो। हालत यह है कि बंगलूर जसे अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जने वाले शहर में न कोई ढंग का विश्वविद्यालय है और न ढंग का पुस्तकालय।

दूसरा संकटग्रस्त क्षेत्र है स्वास्थ्य का। यह संकट दो तरह का है। एक तरफ संपन्न तबके में जीवन शली की वजह से बढ़ती मोटापे, मधुमेह जसी बीमारियों के रूप में। दूसरी तरफ ग्रामीण गरीबों में बढ़ती डायरियां और पीलिया जसी खतरनाक बीमारियों के रूप में। देश के कई हिस्सों में बाल कुपोषण कई अफ्रीकी देशों से भी बदतर हालत में है। एड्स जसे मारक रोग का खतरा तो है ही।

थोड़े से पैसे खर्च करके गरीब अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेज सकते हैं। लेकिन निजी चिकित्सा व्यवस्था में इलाज कराना उनके बूते के बाहर है। सरकारी व्यवस्था में न पूरे कर्मचारी हैं और न बाकी संसाधन। शहरों में शिक्षा हासिल करने वाले डॉक्टर गांवों में नहीं जना चाहते। गांव के लोग तो झोला छाप डॉक्टरों और देसी इलाज के भरोसे ही हैं। दूसरी तरफ समाज के एक दूसरे तबके के लोग कोलेस्टेरॉल हटाने के लिए महंगी दवाएं खाते हैं, और जब छुटकारा नहीं मिलता तो महंगी सजर्री का विकल्प अपनाते हैं।

इसके बाद नंबर है पर्यावरण का। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से आजकल इसकी खासी चर्चा है। पश्चिमी दुनिया में इसे लेकर कई चेतावनियां दी ज रही हैं, डर है कि भारत और चीन जसे जसे अपने पैरों पर खड़े होंगे यह खतरा और बढ़ेगा। चिंता वाजिब है। और सिर्फ अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की वजह से ही नहीं भारत को वसे भी मानव के हाथों होने वाली कुदरत की तबाही के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। हमारी सभी बड़ी नदियां भयानक तौर पर प्रदूषित हैं।

हमारे भूमिगत जल भंडार सूख रहे हैं। इन हालात को नहीं बदला गया तो पीने का पानी दुर्लभ होने लगेगा। हमें न घर के लिए पानी मिलेगा और न खेतों में सिंचाई के लिए। हम जिस तरह से पानी को बरबाद करते हैं, उससे और खेतों में रसायनों के भारी इस्तेमाल से हमारी खाद्य सुरक्षा भारी खतरे में पड़ सकती है। इसके साथ ही पिछले कई दशकों से हो रहे जंगलों के कटान की वजह से गरीबों के लिए जलाऊ लकड़ी और झोपड़ी बनाने का सामान जुटाना तक मुश्किल हो रहा है। पौधों, पक्षियों और पशुओं की कई प्रजतियां समाप्त हो रही हैं। पर्यावरण की दूसरी समस्या शहरों का वायु प्रदूषण भी है। घरेलू और खासतौर पर औद्योगिक कचरे के निस्तारण के लिए कोई नियम कानून नहीं हैं, जिसके चलते पूरी आबादी का स्वास्थ्य खतरे में है। 

जिस चौथे मोर्चे पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है वह है विदेशी मामलों का। हमारे पड़ोस में अस्थिरता भी है और उथल-पुथल भी। पाकिस्तान और बांग्लादेश दोनों में ही इस्लामिक उग्रवाद सर उठा रहा है, साथ ही वहां राजनैतिक महत्वाकांक्षा पालने वाली सेना भी है। नेपाल में एक तरफ जतीय युद्ध चल रहा है, दूसरी तरफ माओवादी हैं जो पूरी दिल से राजनैतिक प्रक्रिया में शामिल नहीं होना चाहते। और पुराने शाही शासन की प्रतिक्रियावादी ताकते भी हैं। श्रीलंका अभी अभी एक बर्बर गृहयुद्ध से गुजरा है। वहां डर है कि सिंहलियों की फौजी जीत तमिलों के गुस्से से पैदा होने वाले आतंकवाद की नई फसल को जन्म दे सकती है।

जिन देशों से हमारी सीमाएं लगती हैं वे आतंकवाद के सामने कमजोर पड़ सकते हैं और हमें शरणार्थियों की बाढ़ ङोलनी पड़ सकती है। फिर दक्षिण एशिया के आगे जकर भी भारत को सोचना है कि दुनिया के सामने अपनी कौन सी तस्वीर पेश करे। अगर हम किसी महाशक्ित से जुड़ते हैं तो क्या यह दीर्घकाल के लिए हमारे राष्ट्रहित के अनुकूल होगा? या फिर हम अमेरिका, रूस, चीन और यूरोपीय संघ सबके साथ रिश्ते मजबूत करते चलें?

मीडिया जब नीतियों पर विचार करता है तो वह अर्थव्यवस्था पर जकर रुक जता है। लेकिन अब मौका है कि हम इन चार मसलों पर भी ध्यान दें। यह सारे मसले अपने आप में तो काफी अहम हैं हीं, साथ ही ये अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक सेहत के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। भारत अपने विकास के कैसे बनाए रख सकेगा अगर यहां के लोग आधुनिक विचारों और तकनीक में दक्ष नहीं होंगे? या फिर अगर हमारी Þामशक्ित स्वस्थ नहीं होगी? या पीने का साफ पानी नहीं मिलेगा और ऊज्र के भरोसेमंद संसाधन नहीं होंगे? या क्षेत्रीय अस्थिरिता की वजह से हमारे बजट का ज्यादतर हिस्सा रक्षा खर्च की मद में स्वाहा हो जाएगा?

ramguha @vsnl .com

लेखक प्रसिद्ध इतिहासकार हैं।

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