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एक पत्रकारी नमूना

वो कस्बाई पत्रकार थे। प्रिंट पत्रकारिता के अवशेष के रूप में तहसील स्तर तक उनकी हनक बरकरार थी। वे पत्रकार इसलिए भी थे उनकी ‘मोपेड’ के आगे पीछे ‘प्रेस’ लिखा हुआ था। उनकी भृकुटियां तनी रहती थीं। ये उनके गंभीर होने का बिम्ब था। किसी ने कभी उन्हें फुल टाइम वाली नौकरी नहीं दी सो वो स्वयं को फ्रीलांसर कहते थे।

चूंकि वो एक कमिटेड पत्रकार थे सो पुलिस महकमे के साथ उनका रोटी-बोटी का रिश्ता था। इसीलिए उनकी ‘मोपेड’ का चालान कभी नहीं हो पाता था। एक दफा उनकी ‘मोपेड’ चोरी हो गई। स्वयं उन्हें और पुलिस को अचंभा ये था कि वो चोर कितना टुच्च और मूर्ख रहा होगा जिसने एक खटारे की चोरी की। दो दिन बाद वही चोर ‘मोपेड’ की मरम्मत करा के पत्रकार जी के पास छोड़ गया। मोपेड पर एक पर्ची चिपकी थी कि ‘माफ करना यार, तुम तो मुझ से भी ज्यादा गए गुजरे निकले। ऐसी चोरी पर मैं खुद शर्मिन्दा हूं।’

जिले के अफसरों से वो ऐसे बात करते जसे उन्होंने अफसरों को रंगे हाथों पकड़ लिया हो। बहुत पहले उनके पास एक बॉक्स कैमरा था जिसमें अक्सर रील नहीं होती थी। मगर वह देखने वालों को हड़काने के काम आता था। थानेदार या अफसर लिहाजदारी में उनके आगे हें, हें, हें करते और अक्सर चाय, कॉफी, सिगरेट व पान मसाला खिला टरका देते। मंत्री-विधायक उन्हें देखते तो औपचारिकतावश पूछ लेते- ‘कहिए पत्रकार बंधु। कैसा चल रहा। कभी घर आइए न।’ वे शाम को घर पहुंच जते। जीम जम कर लौटते। मंत्री-विधायक भी संतुष्ट हो जते चलो भिखारियों को नहीं खिलाया। इन्हें खिला दिया।

एक दिन उन्होंने देखा कि सड़क पर किसी जुलूस पर लाठी चार्ज हो रहा था। उन्होंने जल्दी से मोपेड थाने में रखी और दो अखबार बगल में दबाए भीड़ में घुस गए। जते ही पीएसी वालों से भिड़ गए। जनबूझ कर भिड़े। सिपाही ने पीछे धकेला। वो समझ जुलूस वाला है। वे पीठ के बल गिरे और जनबूझ कर नहीं उठे। आखें पलट दीं। हाय-हाय करने लगे। अखबार छाती पर धर दिए। लोगों ने उठाया। उन्होंने गर्दन लुढ़का दी। सर पकड़ लिया। स्ट्रेचर आया। वे मजे से लेटे। फोटू खिंचे।

अगले दिन फोटो सहित अखबारों में छपा- ‘पत्रकार की पुलिस द्वारा पिटाई।’ उन्हें देखने विधायक आए, अफसर आए। उन्हें वे अस्पताल में सरकारी फल-फूट्र खाते हुए गद्गद दिखे। एक सिपाही व सब-इंस्पेक्टर निलंबित हुए। दरोगा ने दोनों को हड़काया कि- ‘गधों मारने से पहले देख तो लेते किसे मार रहे हो।’ दोनों बोले- ‘सर, हमें क्या पता था कि ये पत्रकार है।’ उधर पत्रकार बंधु सरकारी आर्थिक सहायता की प्रतीक्षा में लेटे थे।

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