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कबीर से डरते हैं हम

उस दिन एक मशहूर मंदिर के पास से गुजर रहा था। बेहद भीड़ थी। इसीलिए अंदर जाने से कतरा रहा था। वहीं आसपास था कि पाया कुछ गुनगुनाने लगा हूं। कबीर साहब का ‘मोको कहां ढूंढ़े रे बंदे..। शायद मंदिर न जने का तर्क ढूंढ़ रहा था इन लाइनों में। थोड़ा सा ही आगे निकला था कि देखा कुछ सौदेबाजी चल रही है।

मैं परेशान हो गया था। सोचता रहा कि यही करना था, तो फिर मंदिर आने की क्या जरूरत थी? प्रभु के दरबार में जने के लिए अगर इतनी जुगत करनी पड़े, तो क्या फायदा? वह तो खर आम आदमी है। प्रभु के दर्शन गलत ढंग से करना चाहता है। प्रभु के साथ हमेशा रहने का दंभ भरने वाला पंडित-पुजरी-पंडा क्या-क्या कर रहा है? सब कुछ करने के बावजूद ये प्रभु के बंदे कहलाते हैं।

कबीर साहब की अगली लाइन पर आता हूं। ‘ना मैं देवल, ना मैं मस्जिद, ना काबे कैलास में।’ क्या कह रहे हैं कबीर के प्रभु। उनके प्रभु साफ कह रहे हैं कि उनकी खोज कहीं बाहर मत करो। उस बाहर की खोज से कुछ भी होने वाला नहीं है। और जब हम बाहर पर ज्यादा जोर देते हैं, तो बाहर ही बाहर भागते रहते हैं।

अपने भीतर ज ही नहीं पाते। अपने को जन नहीं पाते और दुनिया को जनने का दावा करने लगते हैं। इसीलिए कबीर बाहर के किसी भी मुकाम पर ‘उसे’ ढूंढ़ने का विरोध करते हैं। मन अगर साफ नहीं है, तो कहीं कुछ भी नहीं होगा। वह अगर साफ है, तभी प्रभु मिलेंगे। और अगर मन साफ है, तो फिर कहीं जने की जरूरत नहीं है। किसी कर्मकांड की जरूरत ही क्या है?

कल जेठ की पूर्णिमा है। माना जता है कि कबीर उसी दिन जन्मे थे। हम कबीर को कहां-कहां ढूंढ़ने निकल जते हैं! कबीर को अपने भीतर ही नहीं ढूंढ़ते। हम सबके भीतर एक कबीर रहता है। बस हम उसे देखना नहीं चाहते। उससे हमें डर लगता है। कबीर तो मस्तमौला हैं। हम कहां अपने भीतर के मस्तमौला को जीने देते हैं। उस मस्तमौलेपन के लिए तो जोखिम उठाना पड़ता है। और उसके लिए कहां तैयार हो पाते हैं हम!

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