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दुधारू गाय की लात भली

विगत दिन केशवपुरम और कन्हैया नगर के बीच पेड़ गिरने से 1.23 बजे से 3.40 बजे तक, दिलशाद गार्डन-रिठाला की मेट्रो रेल सेवाएं बाधित रहीं, यात्रियों को कष्ट भी हुआ। कुछ यात्री कुछ लोगों का कहना था, ‘हम लोग दस घंटे से परेशान हैं’, ‘यह सब सरकार की मिली-भगत है’, ‘इस मुल्क का क्या होगा?’, ‘इस मेट्रो को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यहां हमारी कोई नहीं सुनता’। इन भले मानुषों से पूछो कि पूरे वर्ष मेट्रो की आरामदेह यात्रा का लुत्फ उठा रहे हो, यदि आंधी तूफान से, पेड़ गिरने से यदि कुछ समय के लिए मेट्रो सेवा बाधित रही है तो भला इसमें सरकार का, मुल्क का, मेट्रो स्टाफ का क्या दोष? दुधारू गाय की लात भली।
राजेन्द्र कुमार सिंह, रोहिणी, दिल्ली

फर्ज को भी याद रखें

आजकल की संतानें वृद्ध मां-बाप को एक बोझ समझने लगे हैं। वृद्ध मां-बाप को जंगलों, रेलवे स्टेशनों व बस स्टाप पर बेसहारा छोड़कर कपूत भाग जते हें। पैसे की अंधी दौड़ में हमारा खून पानी होता ज रहा है। दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा ऐसे ही एक मामले में तीन  (क) पूतों को याद दिलाया गया है कि वे अपनी मां के पास हफ्ते में कम से कम एक बार अवश्य जएं तथा उसे प्रति माह पांच-पांच हजर रुपए दें। बच्चे सम्पत्ति पर अपना हक जताना जनते हैं, फर्ज को याद नहीं रखते।
इन्द्र सिंह धिगान, किंग्जवे कैम्प, दिल्ली

मॉल को अभिशाप न बनाएं

आजकल लोग कुछ भी खरीदने को मॉल की ओर भाग रहे हैं।  मॉल की बढ़ती संस्कृति के कारण छोटे व्यापारियों को कितना घाटा उठाना पड़ता है, इसे भी सोचना चाहिए। मॉल बनाने के लिए पेड़ काटे ज रहे हैं। इससे हमारी धरती की हरियाली प्रभावित होती है और हम साफ हवा नहीं ले पाते हैं। मॉल बनाने से पहले लोगों को सोचना चाहिए कि मॉल वहीं बने, जहां पेड़ कम काटने पड़ें, जिससे पर्यावरण शुद्ध रह सके।
प्रज्ञा, रोहिणी, दिल्ली

नेता से बड़े अमिताभ

ऑस्ट्रेलिया में पढ़ रहे भारतीय बच्चों पर नस्लभेदी हमलों के विरोध में सदी के महानायक द्वारा क्वींसलैंड विश्वविद्यालय ब्रिस्बेन द्वारा दी जने वाली मानद उपाधि लेने से इंकार कर यह सिद्ध कर दिया कि दोहरी ‘मान’ नीति महानायक अमिताभ नहीं सह सकते। सच है देश का अभिनेता कैसा हो- अमिताभ जसा हो। राष्ट्र अमिताभ जी के अनूठे विरोध करने पर शत्-शत् नमन करता है।
सौरभ नागपाल, सादिक नगर, नई दिल्ली

फोटो से झंकती मेहनत

‘हिन्दुस्तान’ ने देश भर में फैले कुदरत को मात देने वाले मेहनतकश तबके की कुछ जीवंत तस्वीरें दिखाई। क्या यह भी सत्य नहीं है कि पुलिस वाले को बिना कुछ दिए कोई भी ऐसी जगह पर दुकानदारी नहीं कर सकता? हमारी दिल्ली में लाखों ऐसे मेहनतकश सड़कों पर, पटरियों पर बैठकर, रेहड़ी लगाकर दुकानदारी करते हैं। आपने समाज की दुखती रग पर हाथ रखा है।
जगदीश खन्ना, विकासपुरी, नई दिल्ली

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