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दोस्ती का हाथ

शंकालु लोग कह रहे हैं कि बातों में क्या धरा है, असली परख तो काम से होगी। शंका करना गलत भी नहीं है। बराक ओबामा नामक व्यक्ति भले ही भरोसेमंद दिखता हो, लेकिन जिस पद पर वे हैं, उस पद पर अरब देशों के निवासी भरोसा करें, ऐसा इतिहास तो नहीं है।

फिर भी बराक ओबामा का काहिरा विश्वविद्यालय में भाषण एक नई शुरुआत है। कई बड़े परिवर्तन शब्दों से ही शुरू हुए हैं, और कुछ हद तक संदेह किया भी जए फिर भी यह मानना चाहिए कि अगर कोई अमेरिकी राष्ट्रपति ऐसा भाषण देता है तो यह किसी बड़े परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है।

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने रिटायर होने के कई साल बाद अमेरिका की इजराइल-फिलस्तीन नीति को गलत कहा था वरना अमेरिका के किसी राष्ट्रपति ने सत्ता में रहते हुए फिलस्तीन के बारे में वहां के लोगों की तकलीफों के बारे में ऐसी बातें नहीं कही, जसी ओबामा ने कही।

इससे कुछ हद तक अमेरिका की विश्वसनीयता फिलस्तीन में बढ़ेगी और इजराइल को भी यह लगेगा कि वह अमेरिका से आंख मूंद कर समर्थन की उम्मीद नहीं कर सकता। यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि इससे मध्य पूर्व की समस्याएं तेजी से सुलझने लगेंगी, लेकिन वे जब भी सुलङोंगी तब ओबामा के इस रुख का उस सुलझव में बहुत महत्व होगा।

दरअसल, एक विवेकपूर्ण और दोस्ताना रवया अपनाकर ओबामा मौजूदा दुनिया में अमेरिका की स्थिति भी मजबूत कर रहे हैं। समूचे मुस्लिम जनमत को अपना विरोधी बनाकर और दूसरी विश्वशक्ितयों के खिलाफ शत्रुतापूर्ण रुख अपनाकर अमेरिका ने बजए एक ध्रुवीय विश्व बनाने के सारी दुनिया में अमेरिका विरोधी ध्रुवीकरण कर दिया।

अफगानिस्तान और इराक के मुद्दों ने अमेरिका के सैनिक वर्चस्व पर सवाल उठा दिए तो आर्थिक मंदी ने उसकी आर्थिक ताकत को संदेहास्पद बना दिया। इस मामले में ओबामा की दोस्ताना पहल जितनी विवेकपूर्ण है, उतनी ही ऊंची रणनीति भी है।

अमेरिका अपने इतिहास में ऐसी कठिन परिस्थितियों में से कम ही गुजरा होगा और ऐसे में दुश्मन न बनाना एक अच्छी नीति है। अगर ओबामा दुनिया भर के आम मुसलमानों को कुछ हद तक आश्वस्त करने में सफल होते हैं कि अमेरिका उनसे मित्रता चाहता है तो कट्टरपंथियों को उनका समर्थन भी कम हो जएगा।

मुद्दा यह नहीं है कि हमास या दक्षिणपंथी इजराइली कितनी उनकी बात सुनते हैं, मुद्दा यह है कि ओबामा और उनकी सरकार ईमानदारी से इस दिशा में कोशिश करती दिखनी चाहिए। बुनियादी सवाल नीयत पर भरोसे का है, उसके बाद व्यावहारिक कठिनाइयां देर-सवेर दूर हो ही जएंगी।

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