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महिला आरक्षण का वक्त

कहते हैं कि बारह बरस में घूरे के दिन भी फिर जाते हैं, लेकिन महिला आरक्षण का मुद्दा है कि पूरे 13 साल से बेताल की तरह डाल पर लटक रहा है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने पिछले साल इसे राज्यसभा में पेश कर अपना वादा पूरा करने की दिशा में एक ठोस पहल की थी।

अब सौ दिन के भीतर महिला आरक्षण बिल पास कराने की घोषणा से लगता है कि सरकार बिल के प्रति गंभीर तो है। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने संबंधी विधेयक लोकसभा में सबसे पहले 1996 में पेश हुआ था। संसद की एक तिहाई सीटें सिर्फ महिलाओं के लिए आरक्षित हो जने के खौफ से कुछ राजनीतिक दल तब से लेकर आज तक इसमें किसी न किसी बहाने अडंगा लगाते रहे हैं।

इसके बावजूद मजे की बात यह है कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर एक महिला आसीन है। देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी की अध्यक्ष भी महिला है। हाल में पहली बार लोकसभा अध्यक्ष जसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी भी एक महिला को सौंपी गई है। और चुनावों में इस बार लोकसभा में महिलाओं की संख्या भी दस प्रतिशत का आंकड़ा पार कर गई है।

कहा अवश्य ज सकता है कि इनमें से ज्यादातर को किसी न किसी राजनेता की बेटी या संबंधी होने का लाभ मिला है। पर क्या लोकसभा में राजनेता-पुत्रों भाई-भतीजों की संख्या कम है? मायावती और ममता बनर्जी जसी महिलाओं को भी देखें, जिन्होंने कठोर लड़ाई जीत कर अपने दम पर अपनी जगह बनाई है। महिलाओं की नेतृत्व क्षमता को लेकर भी तरह-तरह के सवाल उठाए जते रहे हैं, पर क्या यह बात पुरुषों पर लागू नहीं होती?

पिछड़े वर्ग, मुस्लिम समाज या अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं की आड़ में विधेयक के विरोध का असली कारण क्या महिलाओं को बांटने की राजनीति मात्र नहीं? राजनीति में महिलाओं के बढ़ते कद से महिलाओं में उम्मीद जगी है कि महिला आरक्षण विधेयक शीघ्र पारित होगा। सरकार ने आश्वासन देकर उनके हौसलों को और बढ़ा दिया है।

बदले राजनीतिक परिदृश्य में इस बिल के पारित होने में कोई बड़ी अड़चन भी नजर नहीं आती। फिलवक्त कम से कम लोकसभा में इसके समर्थकों का पलड़ा भारी है, जबकि आरक्षण के प्रमुख विरोधी कमजोर स्थिति में हैं। यही सही मौका है, जब बिल पारित हो सकता है।

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  • Web Title:महिला आरक्षण का वक्त