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सड़क, रेल और विमान सेवा में भी छला गया बिहार, सूबे से कोई अंतर्राष्ट्रीय उड़ान नहीं

दुनिया भले छोटी होती गई हो लेकिन आज भी बिहार में एक जगह से दूसरी जगह जाना एक मुश्किल काम बना हुआ है। दूसरे प्रदेश में रहने वाला कोई भी व्यक्ति यह जान कर चकित रह जाता है कि रेलमार्ग से मधुबनी से पटना की 130 किमी की दूरी तय करने में लगभग 10 घंटे लगते हैं जबकि पटना से दिल्ली तक की लगभग एक हजार किमी की दूरी तय करने में मात्र 18 घंटे लगते हैं।

गोपालगंज और बेतिया के बीच की दूरी मात्र 40 किमी है लेकिन घुमावदार और खस्ताहाल सड़क मार्ग के कारण एक जगह से दूसरी जगह जने में 6 घंटे से अधिक लगते हैं। दरअसल एक जगह को दूसरी जगह से जोड़ने के मामले में भी केन्द्र सरकार ने बिहार के साथ भेदभाव किया है। चाहे वह सड़क का मामला हो, रेल की यात्रा हो या विमान का सफर, हर जगह बिहार छला गया है।

कहने को तो बिहार से रेल मंत्री बनने वालों की लम्बी कतार है और हर रेल मंत्री के अपने दावे हैं लेकिन आज भी बिहार के सुदूर इलाकों में रेलगाड़ियां लोगों को हैरत में डालती हैं। जगजीवन राम, रामसुभग सिंह, ललित नारायण मिश्रा, केदार पाण्डेय, जार्ज फर्नाडीस, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार और लालू प्रसाद तक ने रेलवे में सुधार के चाहे लाख दावे किए हों लेकिन इस क्षेत्र में बिहार की हालत ज्यों कि त्यों रही है। प्रति एक लाख की जनसंख्या पर बिहार में रेलमार्ग की लम्बाई मात्र 4.15 किमी है जबकि गुजरात में यह 10. किमी, हरियाणा में 7.34 किमी और पंजब में 8.68 किमी है।

यहां तक कि विशेष श्रेणी के राज्य असम में भी रेल मार्ग का घनत्व बिहार के मुकाबले दुगुना से अधिक है। सबसे हैरत की बात तो यह है कि 90 के दशक में दूसरे राज्यों में इस स्थिति सुधार आया जबकि बिहार में स्थिति में और ज्यादा गिरावट आई है। बिहार में हवाई सफर तो और भी ज्यादा मुश्किल है।

इस राज्य में क्रियाशील हवाई अड्डे मात्र दो ही हैं- पटना और गया। दूसरे राज्यों के अनेक छोटे शहरों को भी अंतर्राष्ट्रीय वायुमार्ग से जोड़ा गया है लेकिन बिहार की राजधानी भी अभी तक उसमें स्थान नहीं पा सकी है।

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  • Web Title:मुश्किलों से भरा है बिहार में सफर