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दो टूक

याद कीजिए वो दिन जब गौरा देवी और उनके साथियों ने पेड़ बचाने के लिए चिपको आंदोलन की शुरुआत की थी। याद कीजिए जब गंगा और नर्मदा बचाने की मुहिम शुरू हुई थी। हममें से कितने लोग उन आंदोलनों को गंभीरता से लेते थे?

कोई किसी की सनक बताता था तो कोई किसी को विकास विरोधी। वो दिन है और आज का दिन.. पर्यावरण देखते-देखते एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। जिंदगी का मुद्दा।

वीरेन्द्र वत्स की चंद लाइनें इस बात की तस्दीक करती हैं- ये क्या दयार जहाँ फूल है न खुशबू है/ कदम-कदम पे फक़त पत्थरों का जदू है/ भरा है काला धुआँ आसमान की हद तक/ अजीब खौफे कयामत जहाँ में हर सू है/ ये आदमी की तरक्की की इंतिहा तो नहीं/ जमीं बदलने लगी बार-बार पहलू है / हम तुम्हारे हैं गुनहगार ऐ नई नस्लो/ नहीं जुनूने तबाही पे खुद का काबू है।

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