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आम आदमी को डालनी होगी ऊर्जा बचाने की आदत

संयुक्त राष्ट्र के इंटरगवन्र्मेटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) के चैयरमैन और द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टेरी) के महानिदेशक डॉ. आर. के. पचौरी का मानना है कि मनुष्य को इतिहास से सबक लेते हुए प्रकृति एवं पर्यावरण की सुरक्षा में हाथ बढ़ाना चाहिए।

इतिहास में माया सभ्यता से लेकर सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया तक के कई उदाहण हैं जो प्रकृति के कोप के कारण लुप्त हो गई। ताजा जिक्र दक्षिण पूर्व एशिया के खमेर साम्राज्य का किया जा सकता है। जलवायु पर्वितन के प्रभावों, आमजन की इसमें भूमिका तथा संभावित खतरों को लेकर उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर आईपीसीसी ने कई रिपोर्टे जारी की हैं। सरकारें भी इस दिशा में सक्रिय होने लगी हैं, लेकिन आम जनता की इस पर प्रतिक्रिया क्या हुई है, क्या लोग इस खतरे को महसूस कर रहे हैं ?
हां, लोगों में जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर लोगों में पर्यावरण के प्रति अभूतपूर्व जागरूकता आई है। ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया। लोग खुद भी अब इन खतरों को महसूस करने लगे हैं।

लेकिन जिस तरह से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन और धरती के गरमाने की बातें कहीं गई हैं, उससे कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि लोग जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगे जबकि समस्या तत्काल उतनी गंभीर नहीं है ?
हमें लोगों को सही सूचना देनी चाहिए ताकि जिन लोगों को इस बारे में सही जानकारी नहीं है या वे यदि सही दिशा में नहीं सोच रहे हैं, तो उन्हें सही तथ्यों से अवगत कराया जा सके।

जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया भी ठीक नहीं है, इसके भी खतरे हैं। मसलन, जैसे कोई तेज तूफान आ जाए या भारी बारिश हो जाए तो लोग अचानक कहने लगते हैं, ‘ओह! जरूर यह जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है।’ कूदकर इस नतीजे पर पहुंच जाना ठीक नहीं है। प्राकृतिक कारणों से मौसम में काफी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। जो एक चक्र में रिपीट भी होते हैं। इतिहास में इनके उदाहरण मिल जाएंगे। इसलिए लोगों को कूद कर इस तरह से नतीजा निकालने से बचना चाहिए। इससे कोई फायदा नहीं है।

हाल में भारत में आईला तूफान ने तबाही मचाई। इससे पहले अमेरिका में कैटरीना, रीटा जैसे तूफानों से सभी वाकिफ हैं। 1995 में हरीकेन्स आए थे। क्या इनकी वजह जलवायु में आ रहे बदलाव हैं ?
हमने अपनी रिपोर्ट्स में मौसम की विनाशकारी घटनाएं (एक्सट्रीम वदर इवेंट) बढ़ने की आशंका जाहिर की है। जैसे, लू के थपेड़े, सूखा, बाढ़, अचानक कुछ मिनटों के लिए भारी बारिश होना या भारी हिमपात होना आदि। लेकिन ये घटनाएं पहले भी होती रही हैं। इनमें नई बात यह है कि इनकी बारंबारता बढ़ रही है। पहले ऐसा बहुत कम होता था अब ज्यादा हो रहा है। इसके बावजूद मौसम की हर विनाशकारी घटना को जलवायु परिवर्तन से नहीं जोड़ा जा सकता है।

क्या जलवायु परिवर्तन के लिए मानव की गतिविधियां जिम्मेदार हैं? जबकि कुछ वज्ञानिक शोध इसके पीछे प्राकृतिक कारण बताते हैं ?
इस मुद्दे पर अब ज्यादा बहस करना बेकार है, यह साबित हो चुका है कि मानवीय गतिविधियों के कारण ही आज जलवायु परिवर्तन की समस्या पैदा हुई है। इतिहास पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि माया, सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया जैसी सभ्यताओं के लुप्त होने के पीछे भी ऐसे ही कारण रहे हैं। ताजा उदाहरण देखना चाहें तो दक्षिण पूर्व एशिया के खमेर साम्राज्य का जिक्र किया जा सकता है। इसलिए जलवायु परिवर्तन मनुष्य जनित है तथा मानव ही अपना व्यवहार बदलकर इस खतरे को कम कर सकता है।

कुछ लोग जलवायु परिवर्तन के इन आकलनों और खतरों पर अभी भी सवाल उठाते हैं कि ये तथ्य कितने सटीक, किसने सही हैं? आप इस बारे में क्या कहेंगे ?
जो आकलन किए गए हैं उन पर तेजी से सर्व सहमति बनती जा रही है। बावजूद इसके अभी भी कुछ लोग हमारे निष्कषरे पर सवाल उठाते हैं, लेकिन इन लोगों की संख्या घट रही है। वज्ञानिक समुदाय ने ही नहीं बल्कि आम लोगों ने भी आईपीसीसी के नतीजों को स्वीकार किया है। लोगों ने माना है कि जलवायु परिवर्तन वास्तविकता है और मानवीय गतिविधियां जलवायु को प्रभावित कर रही हैं।

जलवायु परिवर्तन के एशिया में क्या खतरे होंगे?
बहुत खतरे हैं। सबसे बड़ा संकट पानी का पैदा होगा। तापमान बढ़ने का कृषि पर असर पड़ेगा जिससे खाद्य संकट पैदा होगा। ग्लेशियरों के पिघलने से भी समस्या होगी। हिमालयी ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियों पर भारत के साथ-साथ पड़ोसी देशों के लोग भी निर्भर हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से अभी इनमें पानी बढ़ेगा, लेकिन कुछ दशकों के बाद नदियां सूखने लगेंगी।

इसके अलावा समुद्र के जलस्तर बढ़ने से भी एशिया को खतरा है। एशिया में काफी तटीय क्षेत्र ऐसे हैं जो समुद्र तट से बहुत कम ऊंचाई पर बसे हैं। बांग्लादेश में ऐसे क्षेत्र सबसे ज्यादा हैं। इसके अलावा कई छोटे द्वीप भी हैं जो समुद्र का जलस्तर बढ़ने से डूब जाएंगे। इससे तटीय क्षेत्रों के डूबने के अलावा जमीन के पाने में समुद्र का पानी मिल जाने से उसके खराब होने का भी खतरा है जिससे लोगों के समय पेयजल का भी खतरा पैदा हो जाएगा।

इस खतरे से कौन सबसे ज्यादा प्रभावित होगा?
निश्चित रूप से निर्धन लोग। जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरों का सबसे ज्यादा असर गरीब और विकासशील देशों पर पड़ रहा है। ऐसा नहीं है कि विकसित देशों में इसका असर नहीं होगा, असर होगा, लेकिन वहां भी गरीब लोग ही ज्यादा प्रभावित होंगे। इसलिए विकास एजेंसियों को इस मुद्दे को विकास एवं समानता से जोड़ने हुए काम करना चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय वित्त एजेंसियों को इस चुनौती से निपटने के लिए क्या उपाय करने चाहिए?
जलवायु परिवर्तन की समस्या इसलिए पैदा हुई क्योंकि हम हम सतत विकास के पथ से भटक गए थे। इसलिए आज सबसे पहले जरूरत इस बात की है कि पहले हमें यह समझना होगा किस-किस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर किस-किस प्रकार से हो रहा है। इसके बाद विकास कार्यक्रमों की योजना बनाते समय उनमें जलवायु परिवर्तन के इन खतरों को भी शामिल करना होगा। यदि हम इन बातों को शामिल नहीं करेंगे तो इसका प्रभाव लोगों की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ेगा। अंतत लोगों के कल्याण कार्यक्रम प्रभावित होंगे।

विकास प्रोजेक्ट में कैसे क्लाईमेट चेंज के खतरों का ध्यान रखा जाए?
कोई भी प्रोजेक्ट बनाते समय सबसे पहले इस बात का एसेसमेंट करना होगा कि इससे होने वाली ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कितना है, कैसे उसे कम किया जा सकता है। ऊर्जा की खपत उसमें कैसे कम की जा सकती है। कम ऊर्जा लगेगी तो ग्रीन हाउस गैसें भी कम निकलेंगी। इसके लिए प्रोजेक्ट के डिजाइन में बदलाव करना पड़ सकता है। जो प्रोजेक्ट बन चुके हैं, उनमें भी ऐसे इंतजाम किए जा सकते हैं।

लेकिन एक तरफ विकासशील देशों में ऊर्जा की जरूरतें बढ़ रही हैं, दूसरी तरफ इन देशों पर जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने का दबाव है। ऐसे में विकास और पर्यावरण के बीच कैसे तालमेल बिठाया जा सकता है?
इसके लिए सबसे पहले हमें ऊर्जा की बचत की आदत डालनी होगी। इससे पहले हमें ऊर्जा की मांग में कमी लानी होगी। मसलन देश में बिजली ज्यादातर उत्पादन कोयले से होता है लेकिन हमें इसकी मौजूदा तकनीक को बदलना होगा। हमें कोयले से बिजली बनाने की तकनीक बदलनी होगी। कम कोयले से ज्यादा बिजली पैदा करने वाली तकनीक अपनानी होगी। कम कोयले से ज्यादा बिजली पैदा होने से ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा। स्वच्छ तकनीकों का इस्तेमाल भी ऊर्जा की बचत में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

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