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सीईसी पर्यावरण संरक्षण की सुप्रीम कमेटी

देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए एक पूर्ण रूपेण केंद्रीय मंत्रालय है तथा इसी प्रकार राज्यों में भी वन तथा पर्यावरण मंत्रालय काम कर रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद, यदि सुप्रीम कोर्ट को पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे आना पड़ा है तो जहिर है कहीं न कहीं ये मंत्रालय पर्यावरण के संरक्षण में विफल रहे हैं। प्रेम के प्रतीक ताजमहल को वायु प्रदूषण से बचाना हो या गंगा की सफाई का मामला हो या फिर जंगल, पहाड़ या झीलों का संरक्षण हो, सब पर सुप्रीम कोर्ट ने आदेश पारित किए और इसके बाद से सर्वोच्च अदालत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

दरअसल, पर्यावरण कानूनों के तहत विकास गतिविधियों के लिए केंद्र या राज्य सरकारें जो भी आदेश पारित कर रही थीं, उन्हें लागू करने में दिक्कतें आ रही थीं, क्योंकि अथॉरिटी इन आदेशों की गलत व्याख्या करती और वन क्षेत्रों को गैर वन्य क्षेत्र बताकर वहां कारखाने खोलने, पाइप लाइनें व बिजली की लाइनें बिछाने तथा सड़कें बनाने की अनुमति दे दी जती। अंतत: ये मामले सुप्रीम कोर्ट आए।

लेकिन सवाल यह था कि सुप्रीम कोर्ट के जज पर्यावरण के विशेषज्ञ तो हैं नहीं तो फिर पर्यावरण के मामलों का निपटारा कैसे हो? वन क्या हैं, पर्यावरण और पारिस्थितिकी क्या है, विकास गतिविधियों से यह कैसे प्रभावित होते हैं तथा विकास तथा औद्योगिक गतिविधियों के साथ-साथ पर्यावरण को कैसे संरक्षित किया जए?

ये कुछ ऐसे सवाल थे जिनका सही और संतुलित जवाब पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मई 2002 में केंद्रीय सशक्त समिति (सीईसी-सेंट्रल इंपॉवर्ड कमेटी) का गठन किया। पर्यावरण के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के सहायक (एमाइकस क्यूरी) अधिवक्ता एडीएन राव कहते हैं कि सीईसी की सिफारिशों पर सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण के मामलों में आदेश पारित करता है। कमेटी सुप्रीम कोर्ट आदेशों का कार्यान्वयन भी करवाती है।

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में तीन जजों की विशेष बेंच पर्यावरण के मामलों पर नियमित सुनवाई करती है जिसे फॉरेस्ट बेंच भी कहा जता है। 2007 में कमेटी का कार्यकाल समाप्त होने पर सुप्रीम कोर्ट ने जब इसके पुनर्गठन करने का फैसला किया तो केंद्र सरकार ने इसका विरोध किया लेकिन सरकार के कड़े विरोध के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी का गठन किया और सरकार के दो सदस्यों को इसमें शामिल करने की अनुमति दे दी। इस प्रकार सदस्यों की संख्या सात हो गई। फिलहाल यह कमेटी नदी, पहाड़, जंगल और जमीन से जुड़े मामलों पर अपनी राय देकर पर्यावरण में संतुलन बनाए हुए है।

दो माह पूर्व सीईसी ने अरावली पहाड़ियों पर खनिजों का खनन रोकने की सिफारिश की है जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने खनन पर पूर्ण रोक लगा दी। कमेटी ने कहा था कि यदि खनन पर रोक न लगाई तो देश की राजधानी दिल्ली को रेगिस्तान बनने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। कमेटी की सिफारिश पर ही कार्बेट नेशनल पार्क के बीच सड़क बनाने की उत्तराखंड सरकार की योजना को खारिज किया गया। गोवा में समुद्र के किनारे बने होटलों को हटाने के लिए कमेटी की सिफारिश पर आदेश किया ज चुका है।

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