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सरकार का एजेंडा

राजनैतिक अस्थिरता की कई मजबूरियां होती हैं। कई तरह के दबाव और खींचतान सरकार को आगे बढ़ने से रोकते-टोकते रहते हैं। लेकिन राजनैतिक स्थिरता की अपनी एक ताकत होती है। बृहस्पतिवार को जब राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित किया तो उनके अभिभाषण में सरकार की स्थिरता के आत्मविश्वास की झलक दिखाई दी।

नई सरकार हो तो पहले अभिभाषण में हमेशा ही वादों की भरमार होती है। लेकिन पिछले ऐसे कई मौकों के विपरीत इस बार अगर यह वादे भी किसी आश्वासन की तरह लग रहे हैं तो इसके पीछे चंद रोज पहले आए जनादेश की ताकत है। सरकार का यह कहना कि वह सौ दिन में महिला आरक्षण विधेयक पेश कर देगी, एक बहुत बड़ी उम्मीद बंधाता है।

ऐसा नहीं है कि विधेयक लाने का वादा पहली बार हुआ हो, और यह सोचने का कोई कारण भी नहीं है कि इसकी बाधाएं इस बार कम होंगी। सरकार को बिना शर्त समर्थन देने वाली समाजवादी पार्टी ने अभिभाषण से पहले ही ताल ठोंक दी है। इस बार गणित विधेयक के पक्ष में है, लेकिन फिर भी सरकार को उस तरह की राजनैतिक इच्छाशक्ित दिखानी होगी, जसी उसने अमेरिका से परमाणु समझोते के वक्त दिखाई थी। यूपीए सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में समावेशी विकास की राह चुनी थी।

इस बार उसे नया विस्तार देने का वक्त है। अभिभाषण में उसके लिए भी कई वायदे हैं। गरीबी की रेखा से नीचे वालों को तीन रुपए प्रति किलो की दर पर अनाज देने जसी बातों के अलावा गरीबों के लिए नई आवास योजना भी है और शहरी गरीबों के लिए खास कार्यक्रम भी। देश से स्लम खत्म करने का वायदा स्वागतयोग्य है, बशर्ते यह किसी शहरी सौंदर्यीकरण योजना का हिस्सा न होकर समावेशी विकास की राह से हासिल की गई मंजिल हो।

सरकार इस बार वामपंथियों पर निर्भर नहीं है, इसलिए विनिवेश से इन सारी योजनाओं के लिए संसाधन भी आसानी से जुटाए ज सकते हैं। जहिर है कि पिछले कार्यकाल में ठिठक गया उदारीकरण एक बार फिर जोर पकड़ने वाला है।

सरकार ने अगले सौ दिन के लक्ष्य तय किए हैं। सौ दिन कोई बहुत लंबा समय नहीं होता और मुमकिन है कि इस समय में बहुत सारे लक्ष्य हासिल न भी हो पाएं। लेकिन अभिभाषण यह तो बताता ही है कि सरकार अपने लक्ष्यों को तेजी से हासिल करना चाहती है। शीघ्रता का यह बोध अगर बरकरार रहा तो जल्द ही हमें अपने आस -पास बहुत सारे बदलाव दिखाई देंगे।

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