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थ्येनआनमन की याद

बीस साल पहले पेइचिंग के थ्येनआनमन चौक पर एक भीषण हत्याकांड हुआ था, जिसे चीन में तो कतई नहीं पर बाकी सारी दुनिया में याद किया जा रहा है। चीन सरकार ने इस हत्याकांड को इतिहास से बाहर करने की वे तमाम कोशिशें की हैं, जो कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं का तरीका रहा है। चीन में उस घटना का जिक्र तक करना अपराध है, इसलिए नई पीढ़ी को मालूम तक नहीं है कि ऐसी कोई घटना घटी भी थी।

चोरी-छिपे लोग इसकी याद को न जिलाए रखें, इसलिए चीन में कंप्यूटर पर ट्विटर, यू टच्यूब और कई ब्लॉग नहीं पाए ज सकते। अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता पर तालाबंदी के ये सारे खास कम्युनिस्ट तरीके उस देश में अपनाए ज रहे हैं, जहां की अर्थव्यवस्था इस उदारवादी भूमंडलीकृत विश्व व्यापार में सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है। यह विरोधाभास कई लोगों को आश्चर्यजनक लग सकता है कि एक खुली पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का तालमेल यूं एक बंद साम्यवादी राजनैतिक तंत्र के साथ हो जाए।

लोग यह मान रहे थे कि चीन ने जब से अर्थव्यवस्था में पूंजीवादी तत्वों को बड़े पैमाने पर अपनाया है तो राजनैतिक व्यवस्था में भी खुलापन आना बहुत दूर नहीं है। थ्येनआनमन चौक पर जो छात्र आंदोलन कर रहे थे और उनके जो समर्थक थे, वे भी यही मान रहे थे। उस वक्त के प्रमुख चीनी नेता झओ जियान की जो किताब अभी प्रकाशित हुई है, उसके मुताबिक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्ष पर भी यह द्वंद्व था कि क्या इस विद्रोह को कुचला जए या ज्यादा उदार रवया अपनाया जए।

आखिरकार कट्टरपंथियों की जीत हुई, छात्रों के विद्रोह को बंदूकों और टैंकों से कुचल दिया गया और आज तक न चीन में कोई राजनैतिक उदारता दिखी न प्रत्यक्ष असहमति का कोई प्रदर्शन हुआ। चीन ने कई अजूबा किस्म के काम किए हैं और इसलिए यह कहना थोड़ा मुश्किल लगता है कि कब तक चीन उदार अर्थव्यवस्था और कट्टर राजनीति के संतुलन को निभा पाएगा। क्या सोवियत साम्राज्य की तरह यह व्यवस्था भी ढहेगी या धीरे-धीरे बदलेगी या नहीं बदलेगी। लेकिन थ्येनआनमन हत्याकांड सिर्फ चीनी नहीं, विश्व इतिहास में अंकित एक काला अध्याय है। इस अभिशाप की छाया चीन के चमकदार समृद्ध वर्तमान पर पड़ती ही रहेगी।

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