class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बजट की पेचीदगियां और चुनौतियां

नई संसद ने काम करना शुरू कर दिया है। संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति महोदया ने नई सरकार के कार्यक्रमों और नीतियों का प्रमुखता से उल्लेख किया। इनमें से कई तो दीर्घ अवधि के कार्यक्रम हैं। अभी तो पहली नजर बजट को तैयार करने पर लगी है। पर इस बार बजट तैयार करना कोई आसान कार्य नहीं होगा। कई तरह के विरोधाभासों का सामना करना होगा। बजट को लेकर चिंता के कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:

पहला, विकास दर की गति को बरकरार रखना। पिछले साल को लेकर हाल ही में इस तरह का भ्रम पैदा हुआ था कि जसा लग रहा था उससे कहीं बेहतर हमारे जीडीपी आंकड़े आएंगे। पर आंकड़ों का सावधान विश्लेषण बताता है कि मैन्यूफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल सेक्टर काफी कमजोर रहे। हाल का सुधार  मुख्य रूप से सरकारी कर्मचारियों की बढ़ी तनख्वाह और फलस्वरूप खपत पर पड़ने वाले उसके प्रभाव के चलते हासिल हुआ। निर्यात तो खस्ता हालत में ही रहा। नए रोजगारों का सृजन नहीं हो रहा। तो पहली सबसे बड़ी चुनौती है कि किस तरह विकास के पहिए का चालू रखा जए विशेष रूप से मैन्यूफैक्चरिंग और इंडस्ट्रियल सेक्टर में।

दूसरा, विकास के लिए वित्तीय प्रोत्साहन पर कम निर्भर रहना होगा। राजकोषीय घाटा पहले ही 12 प्रतिशत से ऊपर निकल चुका है और उसमें खर्च का दबाव बढ़ाने की गुंजइश काफी कम है। पिछले 6-8 महीने के दौरान टैक्स दरों को काफी निचले स्तर पर लाने के अलावा राजस्व वसूली में निरंतर कमजोरी बनी रही। राजकोषीय घाटे की ऊंची दर के बावजूद बढ़ते खर्च, राजस्व में कमी, गिरता निर्यात और चालू खाते का ज्यादा घाटा अर्थव्यवस्था की सेहत पर लंबी अवधि में असर डालेगा। तो पहली पेचीदगी यह होगी कि आर्थिक मोर्चे पर स्थिति को और बिगाड़े बिना अर्थव्यवस्था को फिर से कैसे दुरुस्त किया जए। यह ध्यान रखना होगा कि अर्थव्यवस्था की दीर्घकालीन सेहत पर भी इसका गलत असर न पड़े।

तीसरा, खर्च के मोर्चे पर सार्वजनिक व्यय नीति में सुधार काफी समय से लंबित है। प्रणाली में काफी सारा पैसा अटका पड़ा है। सार्वजनिक परियोजनाओं का क्रियान्वयन समय से पीछे चल रहा है। उनकी लागत बढ़ रही है और समय बीतता ज रहा है। प्रक्रिया और प्रणालियां तथा उनके सूराख बड़े सार्वजनिक निवेश के फायदों को बौना कर रहे हैं। सार्वजनिक उपयोग के लिए खर्च की राशि में सिर्फ इजफा कर देना ही सही हल नहीं होगा। वितरण और वास्तविक राशि के प्रवाह में सुधार लाने के लिए प्रचलित नियमों और प्रक्रियाओं पर पुनर्विचार करना होगा। परियोजनाएं बिना विलम्ब और भ्रष्टाचार के किस प्रकार क्रियान्वित हों, यह एक प्रमुख चुनौती रहेगी।

चौथा, हर कोई इस बात से सहमत है कि इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान देना जरूरी है। इस मामले में सबसे कमजोर कड़ी है ऊज्र क्षेत्र। पिछले पांच वर्ष के दौरान ऊज्र क्षेत्र के सुधार रुक से गए हैं। कई राज्य बिजली बोर्ड विद्युत अधिनियम 2003 के अनुरूप जेनरेशन, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन को अलग कंपनियों में विभाजित करने में कामयाब नहीं हुए हैं। ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन से जुड़े अपव्यय अस्वीकार्य स्तर पर कायम हैं। बिजली क्षेत्र के साथ-साथ यदि कोयला क्षेत्र में भी सुधार न किए गए तो ऊज्र की कमी हमें सताती रहेगी।

ऊज्र क्षेत्र में कई अलोकप्रिय और कड़े कदम उठाने ही होंगे। हम जेनरेशन, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन के लिए 11 वीं योजना में तय लक्ष्यों से काफी पीछे चल रहे हैं। ऊज्र की उपलब्धता बढ़ाना न केवल अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए जरूरी है बल्कि कृषि आय में सुधार के लिए भी जरूरी है। इसी तरह, सड़क क्षेत्र संसाधन के बजय क्रियान्वयन की समस्याओं की वजह से पिछड़ रहा है।

टेंडर की प्रक्रिया, उनकी पड़ताल, अनुबंध देना, क्रियान्वयन के दौरान विवादों का निपटान थकाने वाली प्रक्रिया है। सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की भागीदारी वास्तविकता की बजय नारा बन कर रह गई है। पहले हमें यह पहचानना होगा कि राज्य इंफ्रास्टक्चर के मामले में प्रमुख रूप से जिम्मेदारी वहन करें। राज्य की जिम्मेदारी का विकल्प निजी क्षेत्र की भागीदारी नहीं हो सकता। सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की भागीदारी के मूल स्वरूप में परिवर्तन करना होगा।

पांचवां, विकास के साथ रोजगार तैयार करना एक बड़ी चुनौती है। निर्यात का स्तर घटने के साथ विदेशी पूंजी का आगमन थमने से भी रोजगार पर नकारात्मक असर पड़ा है। नौकरी खोने वाले लोगों का आंकड़ा भरोसे लायक नहीं है। समाचारपत्र बता रहे हैं कि, एक करोड़ लोगों ने नौकरी गंवाई है। लेकिन हकीकत में आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है। जरूरी तो इस समय यह है कि एक करोड़ नौकरियों की भरपाई करने के साथ-साथ रोजगार के इंतजर में खड़े लोगों और नए लोगों के लिए रोजगार सृजित किए जएं। बजट में विकास नीति के साथ रोजगार नीति भी पेश की जनी चाहिए।

छठा, सामाजिक क्षेत्र विशेषकर शिक्षा और स्वास्थ्य में ज्यादा काम की जरूरत है। मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में कपिल सिब्बल की नियुक्ित से नई उम्मीदें पैदा हुई हैं। प्राथमिक शिक्षा के मामले में अनिवार्य शिक्षा, स्कूल छोड़ने वालों की दर, लिंग भेद खत्म करना और शिक्षा का स्तर सुधारना प्रमुख है। उच्च शिक्षा में भी रुझन कम होता दिख रहा है। 10 प्रतिशत छात्र ही सेकेंडरी शिक्षा से आगे ज पाते हैं, जो चीन के 25 और विश्व के 38 फीसदी से काफी कम है।

इस स्तर को 15 प्रतिशत तक लाने के लिए 1500 नए संस्थान चाहिए। इसके लिए एचआरडी मंत्रालय के नौकरशाहों को कदम उठाने होंगे। एआईसीटीई, यूजीसी और एक्रिडिशन बॉडीज में सुधार एक बड़ी बाधा साबित हुई है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग की कई सिफारिशें बेकार पड़ी हैं। इसके साथ ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की गुणवत्ता सुधारने, डाक्टरों की मौजूदगी सुनिश्चित करने, न्यूनतम उपकरण मुहैया कराने और सिस्टम को ज्यादा जवाबदेह बनाने की जरूरत है।

तकनीकी अर्थ में बजट बनाना आय और खर्च का गणित है। सही मायने में यह आंकड़ेबाजी से कहीं आगे निकल जता है। यह आर्थिक नीतियों, जीवन स्तर सुधारने और गरीबी को मिटाने से जुड़ा है। वित्त मंत्री के पास सीमित विकल्पों के मुकाबले कहीं ज्यादा चुनौतियां हैं। अगले छह सप्ताह हमें बताएंगे कि देश की अर्थव्यवस्था के कठिन समय में वह इस दुरूह कार्य में कितने सफल रहे। दुरूह इसलिए कि आंतरिक समस्याओं के साथ अतंरराष्ट्रीय स्थितियां भी दबाव डाल रही हैं। हमें नहीं पता कि यह अंतरराष्ट्रीय मंदी कब तक चलेगी। लेकिन विकसित देशों की तुलना में हमारे पास वक्त कम है।

nandu @nksingh. com

लेखक राज्यसभा सदस्य और जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे के न्द्र सरकार में सचिव रह चुके हैं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बजट की पेचीदगियां और चुनौतियां