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बिहार का प्रति व्यक्ति अनुदान देश के औसत से दो तिहाई कम

खाद पर मिलनेवाले अनुदान का लाभ उठाने में भी बिहार फिसड्डी रहा है। पंजब और हरियाणा को प्रति व्यक्ति अनुदान बिहार के मुकाबले क्रमश: पांच और चार गुणा अधिक मिला है। बिहार का नाईट्रोजन-फास्फोरस और पोटाश (एनपीके) पर प्राप्त प्रति व्यक्ति अनुदान देश के औसत के मुकाबले में दो तिहाई से भी कम रहा है। लिहाज इस मद में केन्द्र से मिलने वाली बड़ी राशि से यह राज्य अब तक वंचित रहा है।

जीवन निर्वाह कृषि व्यवस्था (सबसिस्टेंस एग्रेरियन इकोनोमी) वाले इस राज्य के मद की राशि से पंजब और हरियाण जसे राज्यों के संपन्न किसानों की आर्थिक स्थिति और मजबूत होती चली गई जबकि बिहारी किसानों के हालात में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं हुआ। यहां खाद की खपत कम होने के कारण अनुदान नहीं मिल सका। दूसरे राज्यों के किसानों ने माली हालत अच्छी होने के कारण खाद की खपत बढ़ाकर अपने उत्पादन को भी बढ़ाया और अनुदान के मद में केन्द्र से अधिक राशि भी प्राप्त की।

हरित क्रांति वाले दशकों (साठ और सत्तर के दशक) के बाद की स्थिति का आकलन करने पर राज्य की बदहाली का सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है। वर्ष 1981 से 2000 तक बीस वर्ष की अवधि में सिर्फ एनपीके पर मिलने वाले 1614 करोड़ रुपये के अनुदान से यह राज्य वंचित रह गया। यह स्थिति तब है जब तुलना देश के औसत से की जती है। अगर पंजब से इसकी तुलना की जए तो यह राशि बढ़कर 13429 करोड़ रुपये हो जाती है।

अगर सिर्फ एक वर्ष की बात करें तो स्थिति और साफ हो जती है। वर्ष 1999-2000 वह वर्ष है जब बिहार इस मद की सबसे कम राशि से वंचित हुआ था। तब इस राज्य को 220 करोड़ रुपये की क्षति हुई थी। उस वर्ष पंजब को 242.65 रुपये और हरियाणा को 172.65 रुपये प्रति व्यक्ति अनुदान प्राप्त हुआ था। यह बिहारी किसानों को उस वर्ष मिले अनुदान से पांच गुणा अधिक है।

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  • Web Title:खाद पर अनुदान का लाभ उठाने में भी बिहार फिसड्डी