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ब्रेकअप माँ-बाप का बीमार होते बच्चे

ब्रेकअप यानी किसी संबंध का टूटना। जब कोई रिश्ता आप बहुत प्यार से बनाएं और वह रिश्ता टूट जए तो उसका असर ताउम्र रहता है, फिर यदि वह रिश्ता पति-पत्नी का हो तो उसके टूटने से केवल वही प्रभावित नहीं होते बल्कि उनसे कहीं ज्यादा असर बच्चों पर खतरनाक ढंग से पड़ता है, जो बच्चे के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

ब्रेकअप के कारण बेपनाह दर्द रहता है। रिलेशनशिप सिसर्च चैरिटी वन प्लस द्वारा कराए गए अध्ययन के परिणामों में यह स्पष्ट किया गया है कि पति-पत्नी के बीच अलगाव से होने वाले तनाव के कारण 40 फीसदी बच्चों में भावनात्मक और व्यवहार संबंधी परेशानियां पैदा हो जती हैं। पति-पत्नी के बीच आए दिन होने वाले झगड़े और अलगाव बच्चों के लिए कष्टकारी होता है। वे ऐसे माहौल में चिंतित रहने लगते हैं उनमें असुरक्षा की भावना घर कर जती है।

ब्रेकअप की प्रक्रिया से ट्रॉमा में आते हैं बच्चे

ब्रेकअप की बात सुनने में जितनी आसान लगती है, यह उतनी ही कठिन और तकलीफदेह होती है। यह प्रक्रिया इतनी जटिल और लम्बी होती है जिससे माता-पिता के साथ-साथ बच्चों को भी गुजरना पड़ता है। बच्च मानसिक रूप से टूट जता है और इस बीच वह रिश्तेदारों की नजरों में कौतुहल का विषय और साथ ही सामाजिक उपेक्षा का शिकार भी बनता है। 

किसको मानें दोषी, किसको मानें रोलमॉडल

अक्सर देखा गया है कि ब्रेकअप के बाद सवाल उठता है कि बच्च किसके पास रहेगा माता या पिता। अलगाव संबंधी कई कटु मामलों में बच्चे पर माता और पिता अपना-अपना हक जताते हैं। जहिर है यदि बच्च छोटा है तो वह माँ को मिलता है। ऐसे 95 प्रतिशत मामलों में बच्चे माँ को ही मिलते हैं। यह ऐसी उम्र होती है जब बच्चों को माता-पिता दोनों के प्यार की जरूरत होती है। बच्च अपने अभिभावकों को रोल मॉडल बनाता है, पर अलगाव की स्थिति में बच्च असमंजस में पड़ जता है। यदि बच्च माँ के पास रहता है तो वह पिता को दोषी मानता है और यदि वह पिता के पास रहता है तो माँ को दोषी समझता है और कई बार तो उसमें प्रतिरोध की भावना भी उत्पन्न हो जती है जो उसके व्यक्तिगत विकास में बाधक बनती है और वह कई तरह के पूर्वग्रहों से ग्रस्त रहता है।

खुद को मानते हैं जिम्मेदार

जिन बच्चों के माता-पिता का तलाक होता है, वे कुंठित हो जते हैं। उनकी प्रतिभा निखर नहीं पाती। वे अपने दोस्तों के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाते कि उनके माता-पिता के बीच तलाक क्यों हुआ? कई बार वह इस कारण अपने हमउम्र या वयस्कों से जलील भी होते हैं। कई बार वे खुद को इसके लिए दोषी मानने लगते हैं। ऐसे बच्चे सोशल गेदरिंग्स से घबराने लगते हैं और तरह-तरह के कमेंट्स से उनका मनोबल टूटने लगता है। नतीजतन, वह समाज से कटकर रहने लगते हैं। ऐसी स्थिति से गुजरने वाले बच्चे संवेदनशील हो जते हैं और दिन-रात खुद को धिक्कारने लगते हैं। कई बार पति-पत्नी एक-दूसरे के खिलाफ बच्चों के कान भरते हैं। वास्तव में दोषी कौन है, बच्चे समझ नहीं पाते और उनके मन में (माँ या पिता) के प्रति नफरत पनपने लगती है और आगे चलकर ऐसे बच्चे किसी भी (लड़की या लड़के) को लेकर गलत घारणा बना लेते हैं। यही वजह है कि ऐसे बच्चों का ववाहिक जीवन सफल नहीं हो पाता। साथ ही ऐसे बच्चों में आत्महत्या की प्रवत्ति भी अधिक देखने को मिलती है।

अकेलापन है खतरनाक

ब्रेकअप का प्रभाव बच्चों के दिमाग में सालों साल रहता है। बच्चे तनाव में रहने लगते हैं। ऐसी स्थिति से गुजरने वाले बच्चे के व्यवहार में काफी समस्याएं देखी जती हैं। ज्यादातर मामले में बच्चे अंतमरुखी स्वभाव के हो जते हैं। उन्हें एकांत में रहना अच्छा लगता है। ऐसे बच्चे अपने हमउम्र बच्चों के साथ घुलते-मिलते नहीं। छोटी-छोटी बातों में जिद्द करना, जिद्द पूरी न होने पर चीखना-चिल्लाना, किसी भी बात पर अचानक गुस्से में आ जाना, इसके आम लक्षण हैं। ऐसे बच्चे हर काम को करने से पहले ही हाथ खड़े कर देते हैं। किसी जरूरी काम में असफलता हाथ लगने पर जल्दी आत्महत्या की ओर भी प्रेरित हो सकते हैं।

कुछ ऐसे उबरें

जो बच्चे ऐसे हादसे से गुजरते हैं उनमें संबंध टूटने से जो भावनात्मक और संवेदनात्मक चोट पहुंचती है, उससे उबरने के लिए काफी समय लगता है। उनके नन्हें मन में क्या चल रहा है, यह समझ पाना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन आप किसी अच्छे मनोवज्ञानिक की मदद से इस समस्या का हल प्राप्त कर सकते हैं और बच्चे को तनावमुक्त रहने में मदद कर सकते हैं।

यदि पति-पत्नी आम सहमति से ब्रेकअप हुआ है तो उन्हें चाहिए कि वे एक-दूसरे के खिलाफ गलत बात न करें, न ही बच्चों के कान भरें क्योंकि ऐसे में बच्चे इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाते कि वास्तव में दोषी कौन है?  पति-पत्नी को चाहिए कि वे बच्चों को हकीकत से वाकिफ कराएं ताकि उनके मन में अपनी माँ या पिता के प्रति नफरत की भावना न पनपे।

यदि बच्च माँ के साथ रहता है तो उसे पिता से मिलने की इच्छा होगी। ऐसे में उसे उसके पिता से मिलने से न रोकें। इसी प्रकार यदि बच्च पिता के पास है और अपनी माँ से मिलना चाहता है तो उसे मिलने देना चाहिए। माँ या पिता से मिलना उसका नैसर्गिक और कानूनी (अदालत की राय के अनुसार) अर्धिकार है।

बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए उन्हें बिना किसी शर्त के जीवन भर एक-दूसरे (माता-पिता) से संपर्क बनाएं रखने दें।

अक्सर ऐसे बच्चे एकांत में रहना पसंद करते हैं। अभिभावकों को चाहिए कि उन्हें अलग-थलग न पड़े रहने दें बल्कि उनसे ज्यादा से ज्यादा बातचीत करें।

बच्चों की खातिर अपने नेगेटिव इमोशंस को दूर रखें ताकि बच्चे में विरोध की भावना न पनपे।

बच्चों को ज्यादा से ज्यादा दोस्त बनाने के लिए प्रेरित करें। इससे आपके बच्चे का मानसिक जुड़ाव होगा, जो उसकी जिंदगी बदलने के लिए काफी है।

परिवार के सदस्यों को चाहिए कि वे बच्चों का सहारा बनें। वे बच्चों को जली-कटी न सुनाकर उसमें समाज से लड़ने का हौसला जगाएं। उसे यह भी समझने की कोशिश करें कि उसमें उसकी कोई गलती नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा बंधन था जो निभ नहीं सका।

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