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समझें सीटीसी को

आजकल प्राइवेट कंपनियों में वेतन को सीटीसी (यानी कॉस्ट टु कंपनी) के नाम से पुकारा जता है। लोग नई कंपनी में काम शुरू करते समय बड़े उत्साहित होते हैं कि उनकी तनख्वाह पहले से तीस या पचास प्रतिशत ज्यादा हो गई है। लेकिन जब पहली तनख्वाह हाथ में आती है, तो सारा जोश ठंडा पड़ जता है। कारण? नई तनख्वाह पिछली कंपनी में मिलने वाली तनख्वाह से नाम मात्र की ही ज्यादा होती है। इसकी वजह समझने के लिए सीटीसी की गांठ खोलनी होगी, जो आसान काम नहीं है।

छोटा वेतन, मोटा सीटीसी

याद रखें सीटीसी, सकल वेतन और शुद्ध वेतन में अंतर है। सीटीसी का एक हिस्सा सकल वेतन और उसका भी एक हिस्सा नेट वेतन होता है, जो महीने के आखिर में आपके हाथ आता है। आइए इस गुत्थी को सुलझने की कोशिश करते हैं- 

मूल वेतन : सीटीसी में बेसिक सैलरी फिक्स होती है। हर माह ये पूरी रकम आपके हाथ आ जाती है।

भत्तेः मूल वेतन के बाद सीटीसी में मकान किराया, कन्वेंस और एलटीए जसे भत्ते शामिल किए जाते हैं। इनमें से कुछ एक सीमा तक टैक्स फ्री होते हैं, जबकि कुछ उस सीमा तक ही कर मुक्त होते हैं, जितनी राशि आपने उस मद में वास्तव में खर्च की है।

क्लेमः सीटीसी का अगला हिस्सा दावे का होता है। यानी आप बिल पेश करके इस राशि का दावा कर सकते हैं- जैसे कि मोबाइल फोन भत्ता, मेडिकल अलाउंस आदि। सीटीसी में इसकी अधिकतम सीमा निर्धारित कर दी जती है, जिसके बिल पेश करने पर ही भुगतान किया जता है। आमतौर पर इन पर टैक्स नहीं लगता।

कटौतियांः सीटीसी का एक बड़ा हिस्सा अनिवार्य कटौतियों का होता है। जसे कि पीएफ और मेडिकल इंश्योरेंस। ये हिस्सा हर माह आपके हाथ में नहीं आता।

परफॉर्मेस पेः उत्पादकता और कार्य प्रदर्शन पर आधारित ये रकम आपको हर माह नहीं मिलती। और अगर तिमाही, छमाही और सालाना टारगेट सौ फीसदी हासिल हों, तभी आपको ये राशि पूरी मिलेगी।

टैक्सः और आप तो जनते ही हैं, टैक्स से कोई बच नहीं सकता। खास बात ये कि टैक्स कटौती का जिक्र सीटीसी में नहीं होता। अब समझे, हर चमकती चीज सोना कैसे नहीं होती?

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