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खेलः क्रिकेट का असली बॉस कौन

कहा जा रहा है कि इन दिनों विश्व क्रिकेट पर भारत का सिक्का चलता है। उसकी ताकत असीम है, क्रिकेट की दुनिया का पत्ता भी उसकी मर्जी के बगैर नहीं खड़कता। अगर ये तस्वीर कुछ धुंधली रही हो तो आईपीएल 2009 के बाद अब एकदम साफ। ऊपर से शांत दिखती क्रिकेट की दुनिया अंदर ही अंदर काफी खदबदाहट से भरी हुई है। क्रिकेट के साम्राज्य में अगर भारत सुपर पॉवर बनकर उभरा तो कई और नई बातें भी हुईं। नये समीकरण बने। नये तरह के ध्रुवीकरण हुए। दोस्त बदले। दोस्ती के मायने बदले।

भारत और दक्षिण अफ्रीका की दोस्ती परवान चढ़ रही है तो आस्ट्रेलिया भी साथ है। इंग्लैंड और पाकिस्तान अलग पाले में। इंग्लैंड की बेचैनी यह है कि क्रिकेट की सत्ता हाथ से निकल चुकी है, क्रिकेट गलियारों में कद छोटा हो चुका है। वहीं पाकिस्तान और भारत के क्रिकेट बोर्डो में कड़वाहट लगातार बढ़ रही है।

भारत ने जब ट्वेंटी-20 के जरिए अकूत धन का दरवाज खोला उसकी बेचैनी और बढ़ गई। इसी दौरान टेस्ट क्रिकेट दम तोड़ता लग रहा है। वन-डे क्रिकेट का ग्लैमर कम हुआ है।
 
एक जमाने में दोनों में गजब की यारी थी। दोनों ने एक-दूसरे आर्थिक हितों को हाथ मिलाकर साधा था। लेकिन अब वो बीती बात है। अगर साथ हितों का था तो फासले भी थे, इसलिए, क्योंकि हितों पर चोट जो हुई है। पाकिस्तान की नाराजगी का सबब है कि वर्ल्ड कप की मलाई वाली मेजबानी का छिन जना। इसके लिए वो भारत को कसूरवार मानता है। सो उसका झुकाव इंग्लैंड की ओर बढ़ा है। दोनों को चोट भारत से लगी है, इसलिए एजेंडा भी कॉमन- विश्व क्रिकेट में उसकी बढ़त को कम किया जये। लंबे समय से इंग्लैंड और भारत के क्रिकेट संबंधों में असहजता है।

आईसीसी में हमेशा दोनों के बीच तलवारें खींचीं रहती हैं। इंग्लैंड को हमेशा से लगता रहा है कि ये भारत ही है जिसने उसके उस साम्राज्य में सेंध लगाई, जिसे उसने पिछले दो सौ सालों से सींच-सींच कर पोसा था। पहले वर्ल्ड कप इंग्लैंड से बाहर गया। फिर आईसीसी में गद्दी खाली करनी पड़ी। आखिरकार आईसीसी का हेडक्वार्टर भी लार्डस से उठकर दुबई पहुंच गया।

इंग्लैंड क्रिकेट की माली हालत खुद बेहतर नहीं। टेस्ट क्रिकेट में दर्शक आ नहीं रहे। स्पांसर्स का टोटा है। काउंटी क्रिकेट भी खस्ताहाल में है। पाकिस्तान बोर्ड के हाल भी अलग नहीं। देश की अंदरूनी हालत और अराजकता के चलते विदेशी टीमें वहां रुख करती नहीं। अर्थव्यवस्था की चूलें हिली हुई हैं। वर्ल्ड कप मैचों की मेजबानी से कुछ फायदे की उम्मीद जगी थी, वो भी जती रही।

पिछले कुछ साल के आंकड़े बताते हैं कि क्रिकेट की दुनिया में अमीर और गरीब के बीच फासला तेजी से और बहुत ज्यादा बढ़ा है। फोर्ब्स पत्रिका के वर्ष 2006 के आंकड़ों में बीसीसीआई की कुल संपत्ति 1.5 बिलियन डालर आंकी गई थी। इंग्लैंड 270 मिलियन डालर के साथ दूसरे नंबर और आस्ट्रेलिया 225 मिलियन डालर के साथ तीसरे नंबर पर था। आईसीसी की दौलत 200 मिलियन डालर आंकी गई थी। इस फेहरिस्त में पाकिस्तान (100 मिलियन डालर), दक्षिण अफ्रीका (65 मिलियन), श्रीलंका (15 मिलियन) और बांग्लादेश (15 मिलियन) बहुत नीचे थे। ये आंकलन तीन साल पहले का है जब भारत के पास आईपीएल सरीखी सोने की मुर्गी नहीं थी।

एक समय वो भी था, जब 1987 के वर्ल्ड कप को भारत में लाने के लिए बीसीसीआई को गारंटी मनी के लिए रिलायंस के सामने हाथ फैलाना पड़ा था।

उधार मांगकर गारंटी मनी की शर्त पूरी की गई थी। ये बीसीसीआई के लिए सौभाग्य की बात रही कि उदारीकरण के दौर में उसे जगमोहन डालमिया सरीखा शख्स मिला। फिर ललित मोदी ने आकर इसे नया आयाम ही दे डाला। 1987 में रिलायंस वर्ल्ड कप आयोजित करने के बावजूद ये फायदे का सौदा नहीं था। लेकिन इसने डालमिया क्रिकेट में अकूत धन को खींचने के तंत्र को समझ चुके थे। इसीलिए जब 1996 में फिर से वर्ल्ड कप भारत में हुआ तो बीसीसीआई के खजने में अकूत धन बरसा। वे पहले शख्स थे, जिन्होंने समझ क्रिकेट में पैसा कैसे खींचा जा सकता है।

मोदी ने इसी  कड़ी को आगे बढ़ाया। जब क्रिकेट के रेवेन्यू में ठहराव आने लगा था, तब उन्होंने आईपीएल के जरिए एक झटके में बीसीसीआई को कई गुना अमीर बना दिया। भला किस देश में इतनी कुव्वत है कि अपना एक महीने का खेल आयोजन बाहर ले जये। वहां शानोशौकत की वो चमक बिखेरे कि पूरी दुनिया देखती रह जये। यही बीसीसीआई की ताकत है। ऐसे में बीसीसीआई से विद्वेष पालने के बजए एमसीसी को देखना चाहिए कि भारत अगर ये सब कर सका तो कैसे।

लेखक हिन्दुस्तान में समाचार संपादक हैं

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