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भीतरी संन्यास

भक्ति के रास्ते पर चलने वाला व्यक्ति बिना संन्यास के आगे नहीं बढ़ सकता। महान के लिए तुच्छ का त्याग संन्यास है। भक्त क्षणिक इन्द्रिय सुख को अनन्त आनन्द के लिए छोड़ देता है। संन्यास लक्ष्य नहीं आत्मविकास का एक साधन है। बिना फल की आशा के कर्म करना सच्च त्याग है।

ईश्वर स्वयं एक दिव्य संन्यासी है। वह सृष्टि की सारी क्रियाएं बिना लगाव के सम्पन्न करता है। भक्त भी इसी आदर्श पर चलता है। वह चाहे मठ में रहे या फिर घर में, अपने सभी कर्मो को ईश्वर के निमित्त अर्पण कर देता है। उसके लिए सृष्टि एक नाटक या चलचित्र है। वह उसका एक पात्र है, जिसकी भूमिका देर-सबेर समाप्त होगी ही। अपनी वर्तमान भूमिका में पग-पग पर परीक्षाएं कभी-कभी उसमें एक भ्रम पैदा कर देती हैं। पर वह इस दुनियावी चेतना से ऊपर उठकर केवल ईश्वर से नाता जोड़े रखता है। वास्तविक संन्यास यही है।

जीवन में रस लेना अनुचित नहीं। आनन्द का रहस्य है किसी भी वस्तु से लगाव न रखना। फूल की भरपूर सुगन्ध लेते हुए भी, उसके सौन्दर्य में रचयिता के दर्शन करते रहना निर्लिप्तता का लक्षण है। अपनी सभी इंन्द्रियों को भगवान से जोड़ना- जसे आंखें उसके रूप के प्रसाद को देखें, कान उसकी सर्वव्याप्त ध्वनि को सुने, यही ईश्वर से योग है। मिलन है।

प्रभु के पाने के लिए गेरुए वस्त्र पहन कर जंगल में जना जरूरी नहीं। इससे कोई लाभ भी नहीं, क्योंकि हमारी आदतें, इच्छाएं हमें कहीं भी खोज कर जकड़ लेंगी। इनसे मुक्ति पाने के लिए योगी दिल की गुफा में अपने इष्ट को ढूंढ लेता है। फिर वह कहीं भी चला जाए, ईश्वरीय चेतना उसके साथ जती है।

संन्यास नकारने का भाव नहीं स्वीकारने की दशा है। दुख के अतिरिक्त, कुछ भी छोड़ना नहीं होता। यह बलिदान का मार्ग नहीं, बल्कि दैवी निवेश है। इसमें कुछ पैसे लगा कर लाखों आध्यात्मिक रुपए मिल जाते हैं। तो क्या जीवन के उड़ते हुए दिनों के सोने के सिक्के खर्च करके अमर आनन्द प्राप्त कर लेने में बुद्धिमानी नहीं?

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