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हाईवे रॉबर्स की पनाहगाह पीयू

हाईवे रॉबरी को अंजाम देने वालों की पनाहगाह पीयू के हॉस्टल होने की सूचनाओं से विश्वविद्यालय प्रशासन में हड़कंप की स्थिति है। लैपटॉप चोरी और छोटी-मोटी वारदातों से परेशान अधिकारियों के माथे पर अब चिंता की लकीरें और बढ़ गई हैं। इस मामले में जिस तरह के खुलासे हो सकते हैं। वह पीयू की साख के लिए भी अच्छे नहीं हैं।

सूत्रों के अनुसार हाईवे रॉबरी को अंजाम देने वालों में से कुछ लोग, जिनमें इनका सरगना जयपाल भी शामिल है। पीयू के हॉस्टलों में पनाह लेते थे। इन हॉस्टलों में से दो में इनकी खासी पैठ थी। उनका छिपना और खाना-पीना यहीं होता था। छानबीन में जो कुछ खुलकर सामने आया है। उसके अनुसार हाईवे-रॉबर्स के दोस्तों की संख्या भी पीयू में कम नहीं है। अब इस दिशा में पुलिस जांच कर रही है कि क्या पीयू में पढ़ने वाले इनके दोस्त भी रॉबरी जैसी घटनाओं में शामिल होते थे या नहीं या इनकी भूमिका सिर्फ पनाह देने तक सीमित थी। हाईवे रॉबर्स के पीयू में ठहरने के बारे में यह स्पष्ट हुआ है कि वे लगातार नहीं कभी-कभार ही यहां आते थे। जिन छात्रों के साथ आकर वे ठहरते थे, उनकी लगभग पहचान हो चुकी है। जिन छात्रों का नाम सामने आ रहा है। वे एक ही प्रदेश के बताए जाते हैं। इन्हीं में से कुछ लैपटॉप चोरी मामले में भी संदिग्ध माने गए थे। पुलिस भी इन छात्रों पर नजर रखे हुए है। पुख्ता सुबूत मिलते ही धरपकड़ हो सकती है।

आउटसाइडर्स की समस्या पुरानी
पीयू के हॉस्टलों में आउटसाइडर्स की समस्या लगातार बढ़ रही है। लैपटॉप चोरी मामले में भी यही बात सामने आई थी। लैपटॉप चोरी की घटना के बाद हॉस्टल में आउटसाइडर्स को रोकने और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए काफी प्रबंध किए गए। प्रशासन ने टीम बनाकर रात-भोर में औचक छापेमारी भी की, लेकिन वह असफल ही रही। लाख कोशिशों के बावजूद फिर लैपटॉप की चोरी हुई। मोबाइल फोन भी चुराए गए। हालांकि बाद में पुलिस ने आरोपियों को धर-दबोचा। पिछले सप्ताह एक ही हॉस्टल से चार आउटसाइडर्स को दबोचा गया था। ये शहर के ही दो कॉलेजों के छात्र थे और हॉस्टलर की जगह कमरे पर कब्जा जमाए हुए थे। मूल हॉस्टलर इस कमरे में रहता ही नहीं था।

सिफारिशें मानते तो होती सहूलियत
लैपटॉप चोरी की घटना के बाद सुरक्षा के बाबत गठित तत्कालीन कमेटी ने कई सिफारिशें की थीं। इनमें दो सिफारिशें बेहद महत्वपूर्ण थी, लेकिन इन पर गंभीरता से विचार ही नहीं किया गया। हॉस्टलों में सीसीटीवी कैमरे और छात्रों के मोबाइल को लेकर निर्देश भी तय किए गए थे। मोबाइल संबंधी निर्देश में कहा गया था कि छात्र जो भी मोबाइल रखता है उसका (फोन सिम) रजिस्ट्रेशन उसी के नाम पर होना जरूरी है और इसकी पर्याप्त सूची हॉस्टल में उपलब्ध कराई जाए। अगर इस मामले को कड़ाई से लागू कर दिया गया होता तो शायद न तो पुलिस और न ही पीयू प्रशासन के लिए पनाहगाहों को चिन्हित करना चुनौती होती। कॉल डिटेल और फुटेज के जरिए इस केस को सुलझाने और हॉस्टल में छात्रों के तौर पर छिपे बैठे आपराधिक तत्वों को उनकी सही जगह पहुंचाने में देर नहीं लगती।

क्यों लेते हैं ऐसी जगहों पर पनाह
अपराध कर अपने आप को छिपाने के लिए पीयू का हॉस्टल चुनना रॉबर्स के लिए इसलिए पसंदीदा बना क्योंकि यहां पर वे अन्य जगहों की अपेक्षा ज्यादा सेफ रह सकते हैं। दिन भर कैंपस में घूमना-फिरना या फिर कमरे तक सीमित रहना यहां बेहद आसान है। हजारों की संख्या में हम उम्र छात्रों के बीच खो जाने में भी काफी आसानी होती है। यहां अगर आपका खास दोस्त है और पनाह देने को तैयार है तो बगल के कमरे वाले तक को खबर नहीं होगी। अधिकारियों के लिए भी संभव नहीं है कि वे लगभग 5 हजार हॉस्टलर्स पर नजर रख सकें। वैसे कैंपस में सीआईडी तो है, लेकिन उसकी पहुंच भी सीमित ही है। डे स्कॉलर और हॉस्टलर के बीच इक्के-दुक्के चेहरे का खो जाना इन रॉबर्स के लिए आसान बात है। वहीं अगर ये किसी अन्य इलाके में जाएं तो इनकी मूवमेंट सार्वजनिक हो जाती है। आने-जाने का हिसाब कई लोगों के पास हो सकता है। ऐसे में उन लोगों को पहचानना काफी आसान हो जाता है।

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