class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सामाजिक न्याय, यूपीए स्टाइल

सामाजिक न्याय, यूपीए स्टाइल

पंद्रहवीं लोकसभा के गठन के साथ ही सामाजिक न्याय का कारवां एक नए दौर में प्रवेश कर गया। लोकसभा स्पीकर के पद पर मीरा कुमार की ताजपोशी व डिप्टी स्पीकर के रूप में झारखंड के आदिवासी भाजपा नेता करिया मुंडा के निर्विरोध निर्वाचन से देश के लगभग सभी शीर्ष पदों पर ऐसी हस्तियां नमूदार हो गईं, जिन्हें हमारे समाज में कमजोर पक्ष अथवा वंचित वर्ग कहा जता है।

महिला आरक्षण का मामला अभी भी अनसुलझी पहेली लगता है लेकिन प्रतीकात्मक तौर पर भारत के शीर्ष पदों पर महिला, अल्पसंख्यक, दलित और आदिवासी फामरूले का प्रयोग एक गजब संयोग बनकर उभरा है।

प्रधानमंत्री पद पर 2004 में जब पहली बार एक सिख यानी मनमोहन सिंह को बैठाया गया तो पश्चिमी मीडिया ने इस घटनाक्रम को बेहद कौतूहल से देखा था। इस बात पर अटकलें लगीं कि एक हिंदू बहुंसख्यक भारत के लोग एक अल्पसंख्सक को कैसे पीएम कबूल करेंगे। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की मजबूत जड़ों की महिमा देखिए कि वही मनमोहन देश में पुन: पांच वर्ष के लिए न सिर्फ प्रधानमंत्री बने, बल्कि कहीं अधिक मजबूत समर्थन हासिल करने में कामयाब हुए।

यूपीए व कांग्रेस पार्टी को लगातार दूसरी बार जीत दिलाने वाली सोनिया गांधी ने राजनीतिक सूझबूझ से निश्चित ही चौंकाया है। उन्हें गुणाभाग समझने में ज्यादा देर नहीं लगी। डेढ़ बरस पूर्व उन्होंने देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर पहली महिला को बैठाने की पहल कर  पहला धमाका किया। सवा बरस बाद ही उन्होंने लोकसभा के स्पीकर पद पर एक लिखी-पढ़ी दलित महिला मीरा कुमार को बिठाकर समय का पहिया फिर से घुमा दिया। भाजपा ने भी इस पहल का समर्थन करने के साथ उपाध्यक्ष पद पर जने-माने आदिवासी नेता करिया मुंडा को चुन लिया।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सामाजिक न्याय, यूपीए स्टाइल