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दो टूक

एनसीआर और देश के दूसरे कई हिस्सों से हजारों छात्र-छात्राएं दिल्ली में पढ़ने के लिए आते हैं। लेकिन कॉलेज एडमिशन से ज्यादा मुश्किल होता है सिर के ऊपर छत खोजना। मकान किराए बढ़ रहे हैं। हॉस्टलों की संख्या जस की तस हैं।

नतीजा यह है कि दिल्ली के कई इलाकों में एक-एक कमरे में आठ-आठ छात्र रहते हैं। कमरे के हिसाब से नहीं, चारपाई के हिसाब से किराया वसूला जता है। छात्रों की यह भटकन राजधानी और देश दोनों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। अगर हम वाकई नॉलेज सुपरपावर होने का दम भरते हैं, अगर हम सचमुच ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था हैं तो फिर मानव संसाधन की ऐसी बेकदरी क्यों? क्या आज के लीडरों का फर्ज नहीं कि वे कल के लीडरों के लिए पर्याप्त छात्रावासों का इंतजाम करें?

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