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आइए बचें मच्छर की मार से

जैसे-जैसे मनुष्य ने मच्छरजनित रोगों पर काबू पाने के उपाय  किए हैं वसे-वसे मच्छर भी दिनोंदिन बलशाली होता जा रहा है। उसने तमाम मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रमों को धता बताते हुए ‘न मच्छर रहेंगे, न मलेरिया’ जसे मानवीय दावों की हवा निकाल दी है।

मलेरिया के अलावा कुछ और रोग भी बेबस मनुष्य की झोली में मच्छर ने डाल दिए हैं। मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों के बढ़ते प्रकोप को रोकने के उपाय किए गए तो खार आई कि चिकनगुनिया का मच्छर तो साफ पानी में पाया जाता है और रात में नहीं दिन में काटता है। तो इनसे बचाव के भी कई उपाय सामने आए अगरबत्ती, टिकिया, लोशन मगर मच्छर का मुकाबला पूरी तरह हो नहीं पाया। दवा खा कर पहले मरा पर बाद में मच्छर फिर फिर खून पी-पी कर इतना ताकतवर हो गया कि मलेरिया की कारगर क्लोरोक्विन जैसी दवाएं नाकारा कर दीं। 

दो मिलीग्राम से भी कम भार वाले इस खतरनाक जीव ने आज भी मनुष्य का जीना दूभर कर रखा है। दुनियाभर में सासे खतरनाक जीव नन्हा मच्छर करोड़ों को काट कर रोगी बना रहा है। मोटे तौर पर देखा जाए तो रोगों का वाहक मच्छर गंदगी में पनपता है।

देश में आज भी बड़े भाग में शौचालय की सुविधाएं विशेषकर उसके निकास के तरीके उचित नहीं हैं जो गंदगी फैलाते है। वहीं दूसरी ओर खुले गटर, गड्ढे पानी भरी होदियां, नालियां सा कुछ खुला है और गंद लाता है। उस पर शहरों में कूलर, पानी की खुली टंकियां, टॉयर, जैसा अन्य कीड़े मच्छरों के इस परिवार को बढ़ाता है। यह सा कुछ बस्तियों के पास और घर के अंदर भी है, तो भला मच्छर क्यों न पनपें और रोग क्यों न फैले ।

मादा मच्छर का डंक
वैज्ञानिक रोनाल्ड रॉस ने जा पहली बर यह बात उजागर की कि मलेरिया फैलाने के पीछे केवल मादा मच्छर का डंक है तो लोगों को हैरानी हुई । तब और शोध सामने आए पता चला कि मच्छर तो निमित्त मात्र हैं, वह तो वाहक है। मलेरिया का दोषी तो कोई और ही है जो उसको और मनुष्य को अपना ठिकाना बनाए हुए है। मच्छर ने जो स्वस्थ मनुष्य को काटा तो यह आराम से उसके खून में उतर गया और अपना कहर दिखा गया।

इसके बाद जो किसी रोगी को मच्छर ने काटा तो फिर परजीवी मच्छर के अंदर जा पहुंचा। इस तरह से मच्छर और मनुष्य के बीच दूषित रक्त का आदान-प्रदान होता रहा और आराम से रोग बढ़ता-फैलता रहा। इस परजीवी की चार प्रजातियां हैं, प्लाज्मो-डिपम वाईवेक्स, प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम, प्लाज्मोडियम मलेरियाई और प्लाज्मोडियम ओवेल। इनमें वाइवेस्ट्रा आम है जाकि फाल्सीपेरम सासे ज्यादा खतरनाक है जो सीधे मस्तिष्क को प्रभावित करता है। इसके अलावा यह यकृत, गुर्दे और आंतों के अलावा लाल रक्त कोशिकाओं को भी बरबाद कर डालता है ।

ज्यों ही परजीवी मानव शरीर में पहुंचता है, अपना प्रभाव तेजी से बढ़ाने लगता है। आमतौर पर इसका ठिकाना लिवर यानी यकृत होता है। इसके बाद यह लाल रक्त कोशिकाओं में घुस जाता है और उन्हें प्रभावित करता है। इसकी शुरूआत होते ही शरीर का तापमान बढ़ता चला जाता है। भरी गर्मी में भी ठण्ड लगती है और कंपकंपी आती है। इस कारण तेज सिरदर्द होता है और उल्टियां आती हैं। यह सा कुछ दस से पन्द्रह दिन तक चलता है। अगर खून की जांच कर रोग पकड़ में आ जाए तो तत्काल इसका उपचार किया जना चाहिए।

सेरिब्रल मलेरिया जो मस्तिष्क को सीधा प्रभावित करता है और भी गंभीर स्थिति पैदा करता है। चिकित्सकों का कहना है कि अगर दो तीन दिन के अंदर रोग काबू में न आए तो बेहोशी के साथ मृत्यु तक हो जाती है। बच्चों में तो इसका प्रभाव और भी भयंकर होता है । तेज बुखार उनमें ऐंठन पैदा कर उन्हें मनोरोगी बना देता है। अगर जल्द ही दवा का असर हो जाए और बुखार उतर जाए तो रोग काबू में आ जाता है और जान बच जाती है।

आमतौर पर इससे बचाव की सलाह दी जाती है यानी पहली दशा में तो मच्छरों के प्रजनन को रोकने की बात। दूसरी सलाह होती है मच्छरदानी लगा कर सोने की ताकि मच्छर काट ही न पाएं। तीसरा है लोशन या मच्छर भगाऊ या मच्छर मार दवाओं का प्रयोग और अगर मलेरिया हो जाए तो तत्काल डाक्टर की सलाह और कड़वी कुनैन, क्लोरोक्वीन जैसी दवाओं का प्रयोग।

मगर दुखद पहलू यह भी है कि आज मच्छर और परजीवी दोनों पर दवाएं बेअसर भी साबित हो रही हैं। लाख कोशिशों के बाद भी मच्छर वही है, मनुष्य भी और रोग भी वही है, बल्कि रोग है कि महामारी बन रहे हैं। इनसे निबटने के लिए शोध भी लगातार चल रहे हैं। उम्मीद है कि कारगर समाधान भी सामने आएगा, जो लोगों को मच्छरजनित रोगों और मौत से बचाने में कारगर होगा।

एंसीफलाइटिस या दिमागी बुखार
एंसीफलाइटिस की बीमारी संक्रमित मच्छर के काटने से होती है। इस रोग का वाहक क्यूलेक्स विरनुई और क्यूलेक्स ट्राइटीनियोरिक्स मच्छर है। मच्छर काटने के तीन से दस दिन के अंदर ये बीमारी अपने शिकार पर हमला कर सकती है। ये ारूरी नहीं कि मच्छर के काटे गए हर व्यक्ति को ये बीमारी हो ही।

लेकिन पंद्रह साल से कम उम्र के बच्चों और पचास साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्गो को दिमागी बुखार का खतरा ज्यादा रहता है। जो व्यक्ति इसका शिकार हो जाता है, उसको बुखार के अलावा दिमाग में अजीब-सी जलन का एहसास होता है, वह नीम बेहोशी में ज सकता है, और कभी कभी उसकी मौत तक हो सकती है।

एक अनुमान के मुताबिक एंसीफलाइटिस के तीस प्रतिशत रोगी बच नहीं पाते। जहां तक इलाज का सवाल है, बीमार को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता है। मरीज को सांस लेने में दिक्कत होने पर तमाम सपोर्ट देने की जरूरत पड़ती है, और बैक्टीरिया इन्फैक्शन फैलने से बचाने के लिए दवा दी जाती है।

कई मरीज ठीक होने के बाद भी स्नायु तंत्र की स्थायी समस्या से ग्रस्त हो जते हैं। इसकी चपेट में आए 95 प्रतिशत लोग 15 वर्ष से कम उम्र के होते हैं। चूंकि रोग गंभीर है इसलिए अलग अलग लक्षण के लिए अलग अलग दवाएं दी जाती हैं । इस रोग का दुखद पहलू यह है कि स्वस्थ हो जाने के बाद भी 5 से 19 प्रतिशत तक बच्चे मंदबुद्धि हो जाते हैं।

एंसीफलाइटिस का मच्छर खेतों से पनपता है। लेकिन जो उड़ान भरता है तो कहीं भी पहुंचकर आक्रमण करता है। ऐसे में जहां-जहां ये मच्छर ज्यादा हों, उन इलाकों में निकलने से पहले पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए। दिमागी बुखार से बचाव के लिए टीका लगवाना चाहिए। मच्छरों के संपर्क में आने से बचना चाहिए। मच्छर मारक दवा, रिपैलैंट और मच्छरदानी का प्रयोग आपको इससे बचा सकता है। पूरी बाजू के कपड़े पहनने चाहिए।

जापानी एंसीफलाइटिस: ये आम एंसीफलाइटिस से कहीं ज्यादा खतरनाक दिमागी बुखार होता है। इससे मरीज को लकवा, ऐंठन, कोमा और आखिर मौत हो जाने का भी खतरा रहता है। एशिया में हर साल करीब तीस से पचास हार मामले जपानी एंसीफलाइटिस के सामने आ जाते हैं। लेकिन जापानी  एंसीफलाइटिस से बचाव के लिए भी टीका उपलध है जिसकी सुलभता न होने से छोटे शहरों में दिक्कत आती है।

चिकनगुनिया : इधर मच्छर का एक नया कहर चिकनगुनिया भी सामने आया है। हालांकि भारत में ाहुत पहले इस रोग के आने का रिकार्ड है। मगर दो वषरें से इस रोग की घटनाएं देश में पनप रही हैं। इस दौरान देश के डेढ़ सौ से ज्यादा शहरों में दस लाख से ज्यादा रोगी सामने आए हैं, जिनकी संख्या महाराष्ट्र और कर्नाटक में सासे ज्यादा पाई गई। यह मच्छरजनित सांसे खतरनाक रोग है विषाणु पनपने वाला यह रोग गंभीर तो है मगर मृत्युकारक नहीं है। इसका संक्रमण बुखार, सिरदर्द, महीनों चलता जोड़ों का दर्द और शरीर पर लाल चक्कते बन जाना दिखाता है। इसे नियंत्रित करने के लिए विशेष अभियान चलाने के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। फिर भी यह वक्त सावधानी बरतने का है।

डेंगू बुखार
मच्छर की ही देन डेंगू है। इससे प्रभावित रोगी को रोज बुखार आता है, भयंकर सिर दर्द होता है, इसके अलावा आंखों और मांसपेशियों में असहनीय पीड़ा होती है। यही नहीं रोगी के शरीर पर जगह-जगह लाल चक्कते बनने लगते हैं। यही नहीं रोगी का जी मचलाता है और उल्टियां आती हैं। डेंगू का शिकार होने पर मरीा को चार से सात दिन में तो बुखार, सिर दर्द, जोड़ों और मांस पेशियों में दर्द होता है। धीरे धीरे खुजली और ददोरे हाथ, पैर और चेहरे पर फैल जते हैं।

गंभीर दशा में संक्रमण फेंफड़ों में जा पहुंचता है साथ ही रक्त परिभ्रमण व्यवस्था लड़खड़ाने लगती है। रक्तचाप तेजी से गिरने लगता है और ोहोशी आती है झटके पड़ने लगते हैं या ऐसे में अगर रक्त कोशिकाओं की संख्या घटने लगती है तो जिंदगी खतरे में पड़ जाती है। हमारे स्वस्थ शरीर में औसतन डेढ़ से चार लाख तक प्लेटलैटस होती हैं जा यह संख्या घटते घटते 30,000 जा पहुंचती है तो खतरे की स्थिति हो जाती है तो बाहर से प्लेटलैट्स पहुंचाना जरूरी हो जाता है ।

डेंगू बुखार एडीज इजिप्टी मच्छरों के काटे जाने से फैलने वाली वाइरल डिजीज है। ये मच्छर इंसानी बस्तियों में खुले और साफ पानी में पैदा होते हैं, जसे कि ागैर ढक्कन वाली टंकियां, टूटे फूटे सामान, कबाड़ और टायर में भरा पानी। ये मच्छर दिन के समय काटते हैं।

खासकर सुबह के समय और शाम को रात होने से पहले के कुछ घंटे इनके काटने का खतरनाक समय होता है। डेंगू फैलाने वाले चार वाइरस- डेन वन, डेन टू, डेन थ्री और डेन फोर इम्युनोलॉजी के लिहाज से आपस में संबंधित हैं, लेकिन एक दूसरे के प्रति क्रॉस प्रोटेक्शन की इम्युनिटी नहीं देते। दुनिया की तकरीबन ढाई अरा आबादी इस बीमारी की आशंका वाले इलाकों में रहती है। 1981 में क्यूा और 1989 में वेनेजुएला डेंगू की महामारी का मुकाला कर चुके हैं।

पानी में है डेंगू से राहत
डेंगू की कोई कारगर दवा अभी तक नहीं है इसलिए रोग का सहयोगी उपचार किया जाता है। चिकित्सीय सलाह है कि चूंकि इसके संक्रमण से शरीर में तेजी से पानी की कमी होने लगती है अत: रोगी को जमकर पानी पिलाना चाहिए। भले ही कोई कारगर दवा न हो मगर जो भी है उससे रोग पर काबू पाना संभव है।

बचाव में ही सुरक्षा
डेंगू से बचाव के लिए जहां तक हो सके मच्छर के काटने से खुद को बचाएं।

-शरीर का कोई अंग खुला न छोड़ें। पूरी बाजू के कपड़े पहनें।

-मच्छर मारने वाली दवा का प्रयोग करें। डेंगू होने पर बुखार को काबू में करने के लिए डॉक्टर एसिटामिनोफेन देते हैं।

-डेंगू में एस्पिरिन और आक्षूप्रोफेन नहीं लेना चाहिए। खासकर बच्चों को तो एस्पिरिन बिलकुल नहीं देनी चाहिए।

-डेंगू के मरीा को भरपूर आराम और तरल पदार्थो का सेवन करना चाहिए।

-डेंगू बिगड़ने पर मरीज को बुखार के साथ-साथ तेज पेट दर्द, लगातार उल्टियां और चिड़चिड़ापन, सुस्ती और विभ्रम जैसी मानसिक परेशानियां भी हो सकती हैं। ऐसे में मरीज को तुरंत अस्पताल में भर्ती करके ग्लूकोज चढ़ाना जरूरी हो जता है।

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