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डीएनए फिंगरप्रिंटिंग

डीएनए फिंगरप्रिंटिंग का उपयोग आपराधिक मामलों की गुत्थियां सुलझने के लिए किया जता है। इसके साथ ही मातृत्व, पितृत्व या व्यक्तिगत पहचान निर्धारित करने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है। वर्तमान में पहचान ढूंढ़ने के तरीकों में फिंगरप्रिंटिंग सासे बेहतर मानी जाती है। जीव-जंतुओं, मनुष्यों में विशेष संरचनायुक्त वह रसायन जो उसे विशिष्ट पहचान प्रदान करता है, उसे डीएनए (डाई राक्षो न्यूक्लिक एसिड) कहा जता है। शरीर में मौजूद खराबों कोशिकाओं के क्रियाकलाप डीएनए से तय होते हैं, हालांकि डीएनए कणों का ढांचा हर व्यक्ति में एक समान होता है, लेकिन उन्हें गढ़ने वाले बुनियादी अवयवों (बेस पेपर) का क्रम सभी में समान नहीं होता। डीएनए फिंगरप्रिंटिंग में एक ही प्रजति के सदस्यों के बीच पहचान ढूंढ़ने के लिए इस अंतर का उपयोग किया जाता है।

1984 में ब्रिटिश लीसेस्टर विश्वविद्यालय के वज्ञानिक सर एलेक जेफ्रेज ने इस तकनीक विकसित की थी। इस पद्धति में किसी व्यक्ति के जविक अंशों जैसे बाल, लार, वीर्य या अन्य कोशिका-स्रोतों के सहारे उसके डीएनए की पहचान की जाती है। डीएनए फिंगरप्रिंट स्पेसिफिक तरीके के डीएनए क्रम का इस्तेमाल करता है, जिसे माइक्रोसेटेलाइट कहा जाता है। माइक्रोसेटेलाइट डीएनए के छोटे टुकड़े होते हैं। शरीर के कुछ हिस्सों में इनकी संख्या अलग-अलग होती है।

फोरेंसिक विज्ञान में डीएनए फिंगरप्रिंट का खासा उपयोग होता है। साथ ही फोरेंसिक में जांच के लिए वास्तविक फिंगरप्रिंट की जरूरत नहीं पड़ती। इसकी मदद से अपराधी को एक बूंद के आधार पर ही पकड़ा जा सकता है। डीएनए फिंगरप्रिंट के लिए बाल, लार या खून का डीएनए सैंपल लिया जाता है। डीएनए एंजाइम के द्वारा सेंगमेंटाइज्ड किया जता है। इसके बाद इसकी छानाबीन करके इसे एक्सरेफिल्म पर एक्सपोज किया जाता है। जहां वह लैक बार बनाते हैं, जिन्हें डीएनए फिंगरप्रिंट कहा जाता है।

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