class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

बड़े मंत्रिमंडल पर भारी विडंबनाएं

इक्कीसवीं सदी का हिन्दुस्तान रामायण महाभारत के युग वाले भारत से बहुत फर्क है। इसीलिए उस सीख को गांठ बांधना बेहद नुकसानदेह साबित हो सकता है, जिसमें यह ज्ञान दिया गया है कि कोउ नृप होय हमहु का हानि? जनतंत्र में शासक जनता के प्रतिनिधि होते हैं, भले ही अक्सर उनके तेवर और अंदाज पुराने जमाने के राजा-रानियों जैसे नज़र आते हैं। जो ममता बेनर्जी माक्र्सवादी खेमे के लिए कर्कशा से बदतर थी, वह आज रेल मंत्रालय की सर्वेसर्वा है और इसी विभाग के भाग्यविधाता लालू यादव आज रंक नहीं तो फकीर के बाने में दिखने लगे हैं। इसीलिए नये मंत्रिमंडल के गठन का विश्लेषण इसी संदर्भ में किया जाना चाहिए। जिस मंत्रालय का राजपाट जिस व्यक्ति को सौंपा गया है, उसकी योग्यता, अनुभव, क्षमता और ईमानदारी का नफा-नुकसान हम सभी को देर-सवेर होगा। यह कहने भर से हम अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा नहीं पा सकते कि यह तो प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है और जो कुछ करने-धरने को बचा रहता है, वह पार्टी अध्यक्ष सोनिया जी और फिलहाल युवक हृदय सम्राट राहुल ने कर ही डाला होगा। जनतंत्र का तकाजा यह भी है कि जनता के लिए, जनता के द्वारा, जनता का राज पारदर्शी ढंग से चलाया जाये। हम सभी को इस मामले में सतर्क रहने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री के विशेषाधिकार वाली स्थापना की धज्जियां डीएमके सुप्रीमो करूणानिधि ने शुरू में ही उड़ा दी। वंशवादी भारतीय जनतंत्र की परंपरा को ध्यान में रखने के बाद भी उनका खुदगर्ज परिवार प्रेमी आचरण असहनीय और अश्लील ही कहा जा सकता है। अपने संयुक्त और विस्तृत कुटुम्ब-कबीले में जमीन-जायजाद के झगड़े की तरह केन्द्रीय सरकार में हिस्सेदारी को सूबेदारी या जागीर की तरह लूट-खसोट कर बांटना नाजायज ही समझ जाना चाहिए। उनके रिश्तेदारों को संतुष्ट रखने की कीमत देश क्यों चुकाये? ऊपर से तुर्रा यह कि मंत्रालय भी अपने पसंदीदा ही लेंगे। मनमोहन सिंह की तारीफ कम से कम इस बात के लिए तो करनी ही पड़ेगी कि उन्होंने इस अशोभनीय सौदेबाजी का पर्दाफाश कर दिया। पर अंततः उन्हें द्रविड़ भयादोहन के सामने खुद को समर्पण करना ही पड़ा। शुरू में परोक्ष रूप से ही सही यह बात साफ कर दी गई थी कि प्रधानमंत्री अपने मंत्रिमंडल में राजा और बालू को शामिल नहीं करना चाहते, क्योंकि पिछली बार यह दोनों महानुभाव अकर्मण्य ही साबित हुए थे और इनका आचरण विवादास्पद रहा था। दूरसंचार क्रांति को पटरी से उतारने में राजा कामयाब रहे और स्पैक्ट्रम के बंटवारे में उनका फैसला विवादास्पद रहा। मंत्री महोदय ने स्वयं यह बात स्वीकार की थी कि अपने पु़त्र की कंपनी को रियायती दर पर गैस सुलभ कराने को उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय से संबंधित मंत्रालय को सिफारिशी पत्र लिखवाये थे। पोल खुल जाने के बाद भी उनकी दहाड़ती सीनाजोरी बरकरार रही। उनकी नियुक्ति को करूणानिधि ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया और न केवल राजा राजधानी में वापस लौटे, बल्कि अपनी पुरानी रियासत पर भी काबिज़ हो गये। यह याद रखने लायक है कि डीएमके ही एक योग्य मंत्री और रिश्तेदार दयानिधि मारन को हटाकर इन्हें इस कुर्सी पर करुणानिधि ने बैठाया था। दयानिधि से रूठने का कारण अझगिरी के साथ उनकी स्पर्धा और द्वेष बतलाया जाता है। विडंबना यह है कि आज दोनों एक साथ एक ही मंत्रिमंडल के सदस्य हैं, हा लाडले बड़े बेटे का हाल बेहतर है, वह ज्यादा महत्वपूर्ण विभाग के कर्ता-धर्ता हैं। गनीमत यही है कि बालू को पुनः स्थापित और प्रतिष्ठित नहीं किया गया है और कुलदीपिका कनीमोजी ने फिलहाल पारिवारिक शांति और राष्ट्रहित में त्यागी तपस्वी मुद्रा अपनाई है। कहने को सरकार के फैसलों में सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत सवरेपरि होता है, पर यह लगता है कि डीएमके के मंत्री पर लागू नहीं होता। इस सहयोगी समर्थक पार्टी के सदस्यों को मनमानी करनी की छूट इस बार प्रधानमंत्री नहीं देंगे। इन मंत्री रूपी नृपों पर कड़ी नज़र रखने की जरूरत है। इस बार मनमोहन सिंह की ऐसी कोई विवशता नहीं कि पिछली सरकार में वामपंथियों की तर्ज पर अपनी नकेल वह इन्हें थमा दे। यह बात याद दिलाई जाने लगी है कि तमिलनाडु में डीएमके सरकार कांग्रेस के समर्थन पर टिकी है।

दूसरी शर्मनाक नियुक्ति विलासराव देशमुख की है। इन महानुभाव को मुम्बई पर दहशतगर्द हमले के बाद अकर्मण्यता के लिए पद त्यागने को मजबूर होना पड़ा था। पूरा देश उस तमाशे से भौंचक्का रह गया था, जब विलासराव फिल्म स्टार बनने की हसरत पालने वाले अपने बेटे और उनके पथ-प्रदर्शक फिल्म निर्दशक राम गोपाल वर्मा के साथ तबाही और लाशों का नज़ारा करने मौकाए वारदात पर चहल कदमी करते दिखे। यह सज्जन न तो लोकसभा का चुनाव जीतकर पहुंचे हैं और न हीं राज्यसभा के सदस्य हैं। अटकल यही लगाई जा सकती है कि शरद पवार का कद छोटा करने के लिए ही इन्हें चढ़ाया जा रहा है। एक बार फिर यह सवाला उठाना जरूरी है कि इस ईनाम की कीमत देश क्यों चुकाये?

जिस समय मंत्रियों के नामों और विभागों की सूची घोषित की जा रही थी, उस समय समाचार पत्रों और टेलिविजन चैनलों सुर्खियों में कुछ बड़ी अटपटी टिप्पणिया पढ़ने को मिल रही थी। अमुक दलित नेता है या अल्पसंख्यक कोटे वाला, महिला खाते का या एक क्षेत्र विशेष का नुमाइंदा। इसके अलावा ऐसे भी बहुतेरे थे, जो कांग्रेस पार्टी की आला कमान में असरदार व्यक्ति के करीबी बताये जा रहे थे। एक और श्रेणी का जिक्र जरूरी है। सरकारी नौकरी में पुराना दस्तूर है कि कार्यरत कर्मचारी के देहांत के बाद उसके आश्रित व्यक्ति को उसकी एवज में नौकरी दी जाती है। लगता है कि हमारे जनतंत्र में मंत्रियों की नियुक्ति के लिए भी मृतकाश्रित कोटा है। यहां हम ज्योतिरादित्य सिंधिया या सचिन पायलेट अथवा जितिन प्रसाद की बात नहीं कर रहे, वे तो राहुल ब्रिग्रेड के युवा कोटे के हैं और अपनी योग्यता और क्षमता के लिए किसी के प्रमाणपत्र के मोहताज नहीं। हमारा इशारा मीरा कुमार की तरफ है, जो हर सरकार में अपने यशस्वी पिता के नाम की पूंजी को भुनाते अपनी जगह आरक्षित कराती रही है। सुदीर्घ काल से उपलब्धि के नाम पर वह कुछ दर्ज नहीं करा सकी है। अगर मनमोहन सिंह और कांग्रेस यह सोच रहे है कि उन्हें इसका कोई फायदा बिहार में होने वाला है तो उन्हें निराश ही होना पड़ेगा।

यह न समङों कि हम मंत्रिमंडल और विभागों के वितरण को लेकर छाती कूट रहे हैं। हमारी राय में कुछ मंत्रालयों को पहली बार महत्वपूर्ण समझ गया है और उन्हें सुयोग्य व्यक्तियों को सौंपा गया है। कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कमलनाथ और जयराम रमेश इसके बेहतरीन उदाहरण हैं।

pushpeshpant@gmail.com
लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:बड़े मंत्रिमंडल पर भारी विडंबनाएं