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ब्लॉग वार्ताः लखीमपुर खीरी का पर्यावरण

यह जनपद एक दर्जन छोटी-बड़ी नदियों वाला सुंदर भूभाग है, जहां शाखू के विशाल वन हैं, किंतु यहां की चीनी मिलों ने नदियों में अपना प्रदूषित जल छोड़ कर उनके पारिस्थितिक तंत्र को नष्ट कर दिया है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी की इस व्यथा कथा पर मुल्क में बहस नहीं है। लखीमपुर खीरी की दर्जनों नदियां मर रही हैं, इस पर किसी मायावती या किसी मनमोहन सिंह की नजर भी नहीं होगी।

शायद इसीलिए हिंदी के ब्लॉगर अपनी-अपनी दिलचस्पियों को आंदोलन में बदल रहे हैं। पिछले बीस साल से वन्य जीवों के बारे में लिख रहे कृष्णकुमार मिश्रा का वन्य जीवों पर ब्लॉग लखीमपुर खीरी के पर्यावरण और वन्य जीवन के बारे में अच्छी जानकारी दे रहा है। जंगल कथा पर जाने के लिए क्लिक कीजिए http: // krishnakumarmishra .blogspot .com।

कृष्ण कुमार कहते हैं कि नेशनल पार्क तो उपेक्षित हैं ही, लेकिन हमारे खेत-खलिहानों से गायब होती वनस्पतियों पर किसी की नजर नहीं है। ब्लॉगर ने अपने ननिहाल के एक फूल पदबिछुआ का जिक्र किया है।

गुलाबी रंग के इस फूल को महिलायें अपने पांव में बिछुआ की तरह पहनती हैं लेकिन इस फूल के दांत जब चुभ जाएं तो निकालना मुश्किल हो जाता है। बिच्छू की तरह डंस लेते हैं।

जंगल कथा ब्लॉग पर पचास सियारों के मारे जाने की दिल दहला देने वाली कथा है। मिश्रा लिखते हैं कि धौरहरा तहसील के केशवापुर-कलां में एक ऐसी घटना घटी, जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता।

एक मिनी शुगर प्लांट में बनने वाले गुड़ के टुकड़ों की तलाश में सियार आ जाया करते थे। ये सियार बेकार पड़े शीरे को पीकर मस्त हो जाते थे। लेकिन मालिक को बर्दाश्त न हुआ और उसने शीरे में जहर मिला दिया।

अचानक अगली सुबह खेतों में पचास सियार मरे पड़े मिले और साथ में बड़ी संख्या में चील कौवे भी। मिश्रा बताते हैं कि हमारी जातक कथाओं में सियार को कितना सहृदय जानवर के रूप में पेश किया गया है। जैसे दलदल में फंसे शेर को बचाना, एक मानव के बच्चे को अपने बच्चे के रूप में पालना जो आज मोगली के नाम से मशहूर है।

जंगल कथा ब्लॉग पर इस इलाके में मारे जाने वाले बाघों का भी विस्तार से दस्तावेज तैयार किया गया है। मैलानी रेंज की मुरेहना बीट के पास घायल बाघ की कहानी बेचैन करने वाली है। असम रोड के किनारे किसी भारी वाहन से टकराकर जख्मी हुआ यह बाघ तड़प रहा था। लोगों की भीड़ उसकी पीड़ा को बढ़ा रही थी। वह घिसट-घिसट कर भागने की कोशिश कर रहा था।

इस लेख को पढ़ कर खुद पर शर्म आती है कि अपनी फौरी जिज्ञासाओं के कारण हम जानवरों की तकलीफें कितनी बढ़ा देते हैं।

एक और ब्लॉगर हैं पंकज अवधिया। पंकज कई सालों से वनस्पतियों के औषधीय गुणों का दस्तावेज तैयार कर रहे हैं। पंकज के ब्लॉग की पहले भी चर्चा कर चुका हूं। पंकज ने मई महीने में कान्हा नेशनल पार्क से लौट कर जो लिखा है, उसे एक बार तो पढ़ना ही चाहिए। मेरी प्रतिक्रिया पर जाने के लिए क्िलक कीजिए http: // pratikriyaa .blogspot .com।

पंकज लिखते हैं कि कान्हा मुङो पर्यटकों के दबाव में ऐसा बीमार लगा कि कम से कम तीन साल तक इसे अपने हाल पर छोड़ देने का अनुमोदन करने का मन हुआ। पर मुङो मालूम है कि पर्यटकों का जबरदस्त दबाव ङोल रहे वन्य प्राणियों की किसी को चिंता नहीं है। वे तो जब तक बचे रहेंगे तब तक जिप्सियों में सवार आंखें उन्हें घूरती रहेंगी। वे इस धरती से विदा भी कैमरे की क्लिक के साथ लेंगे।

पंकज लिखते हैं कि कान्हा जैसे नेशनल पार्कों की जमीनी हकीकत के बारे में लिखकर मैं योजनाकारों को झकझोरना चाहता हूं।

ये वो ब्लॉग हैं, जो हिंदी ब्लॉगिंग ही नहीं, बल्कि हिंदी बहस संसार को भी विविधता प्रदान करते हैं। पंकज बता रहे हैं कि कान्हा पार्क के अंदर गुटखे का रैपर फेंकना तो मना है, लेकिन थूकने पर कोई रोक नहीं।

अब इन थूके गए तंबाकू को चाटने में बंदर माहिर हो गए हैं। इतना ही नहीं थूके गए तंबाकू के कारण पंगडंडियों के किनारे खास किस्म की वनस्पतियां भी खत्म हो रही हैं।

पंकज लिखते हैं कि कान्हा जंगली भैंसों के लिए भी प्रसिद्घ है। लेकिन इन भैंसों ने अब हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है।

काश भैंसों से ही हम कुछ सीख सकते। ये ब्लॉगर इस धारणा को तोड़ रहे हैं कि वन्य जीवों पर सिर्फ अंग्रेजी में ही बेहतरीन लेखन हो सकता है। पंकज और कृष्ण कुमार ने हर लेख मौके पर पहुंच कर पूरी जानकारी के साथ लिखे हैं।


ravish@ndtv.com
लेखक का ब्लॉग है naisadak.blogspot.com

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