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गंगा अवतरण

गंगा दशहरा, गांगाजी का अवतरण अथवा जन्म दिवस है। विश्व की इस अप्रतिम पवित्र नदी का संबंध तीनों देवों और तीनों लोकों से है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शिव के नृत्य से द्रवीभूत होकर जो ब्रह्मद्रव हुआ, उसे ब्रह्म जी ने कमण्डल में भर लिया। यह जल विष्णु पदों का प्रक्षालन करता हुआ, भगीरथ के तपस्या-यत्न से भूमि पर गंगा के रूप में आया और इस आशंका से कि अतिशय वेग के कारण वे सीधे पाताल में न पहुंच जाए, भगवान शंकर ने उन्हें अपने जटाकल्प पर अवतरित कर लिया।

राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को कपिल मुनि द्वारा भस्म कर देने पर उनकी आत्माओं के उद्धार हेतु, सगर के पौत्र भगीरथ, जो अंशुमान के पुत्र थे, गंगा जी को पृथ्वी पर लाए। वामनपुराण के अनुसार जब भगवान वामन ने विराट रूप धारण कर तीनों लोक नापे तो उनका चरण ब्रम्हाण्ड के कपाल पर पड़ा, जिससे उसमें खल्वाट हो गया और पवित्र जलधार फूट पड़ी। यही विष्णुपदी या गंगा है। स्वर्ग में वे मंदाकिनी, पृथ्वी पर गंगा और पातालपुरी में भोगवती के नाम से प्रसिद्घ है। इस प्रकार वे त्रिपथगा है।

हिमालय पर गोमुख से निकलकर आगे बढ़ती हुई वे अल्हड़ वेग से जन्हुव ऋषि के आश्राम पहुंचती है। ध्यानस्थ मुनि ने विशाल जल प्रवाह आता देख उसे सम्पूर्ण में पान कर लिया। बाद में भगीरथ की प्रार्थना पर उन्हें निरुसृत कर दिया। इस कारण वे जन्हुवसुता भी कहलाती है। ग्वेद में दस प्रधान नदियों में गंगा का उल्लेख है। पुराणों में अनेक कथाएं है।

महाभारत, वनपर्व के अध्याय 86 के अनुसार गंगा के तटवर्ती सभी स्थान सिद्घक्षेत्र है। इसलिए गंगा के तट पर अनेक तीर्थ है। केवल प्रयाग में साठ करोड़ दस हजार तीर्थों का निवास है। वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, पंडित जगन्नाथ दास रत्नाकर, गोस्वामी तुलसीदास, पद्माकर, रत्नाकर और भारतेन्दु ने तो गंगा मैया की विविध भांति संस्तुतियां की है, मुस्लिम कवि रहीम और रसखान भी पीछे नहीं रहे। यही गंगा आज प्रदूषण का दंश ङोल रही है। इसके पहले कि देर हो जाए, समाज को सचेष्ट हो जाना चाहिए।

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