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दहेज हत्या की सज

दहेज के लिए किसी महिला को जलाकर मार देने वालों के प्रति कोई रहम नहीं दिखाया जाना चाहिए और उन्हें फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए। जब अदालत ऐसी टिप्पणी करे तो साफ है कि इस जघन्य अपराध के खिलाफ कड़े कदम उठाने का वक्त आ गया है। पर दहेज का दानव जिस तरह अपने पांव पसारता जा रहा है, उसे देखकर नहीं लगता कि इसके कदम सिर्फ हत्यारे को फांसी देने की घोषणा से रुक पाएंगे। दहेज के लिए बहुओं को जलाना, पत्नी को पीटना, उस पर अत्याचार करना या मार देना एक अमानवीय कृत्य है। कुछ समुदायों में तो दहेज के नाम पर दूल्हों का खुला व्यापार हो रहा है। दूल्हों की कीमत लगती देख ऐसा लगता है जैसे उनमें आत्मसम्मान जैसी कोई चीज ही नहीं है। उधर दहेज के लिए मारी जाने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। 2005 में दहेज-हत्या के 6,787 मामले थे। 2006 में यह बढ़कर 7,618 और 2007 में 8,093 हो गए। भौतिक सुख-सुविधाओं और अपने ऐशो-आराम की चीजों के लिए दहेज लोभी इस कुरीति को बढ़ावा दे रहे हैं।

विडम्बना यह है कि जिसके पास जितना ज्यादा है, वह उतना ही मुंह फाड़ कर मांगता नजर आता है। उनकी देखा-देखी कम पैसे वाले भी अपनी औकात से ज्यादा दहेज जुटाने या मांगने की जुर्रत कर बैठते हैं। ऐसे में इस पर अंकुश लगे तो कैसे? दहेज विरोधी कानून की धारा 498-ए विवाहित महिला की प्रताड़ना रोकने में सक्षम होते हुए भी एक हद से आगे असहाय नजर आती है, क्योंकि पारिवारिक इज्जत गिरने के भय से दहेज उत्पीड़न के ज्यादातर मामले आज भी दर्ज नहीं होते। जो मामले दर्ज हो भी जते हैं तो उनमें से ज्यादातर में चाजर्शीट नहीं होती। अदालत में वर्षो केस खिंचने के कारण थक-हार कर पीड़ित पक्ष अक्सर समझौता करने पर मजबूर हो जाता है। सजा का प्रतिशत बहुत कम होने के कारण अपराधी बच जाते हैं। इसके बावजूद कुछ लोग इस धारा के दुरुपयोग की बात करते नहीं थकते। अपवाद स्वरूप कुछ मामले ऐसे हो सकते हैं, इसके लिए कानून को ठीक से लागू किया जाना जरूरी है। ऐसे मामलों में फांसी की सजा देना विवाद का विषय है, पर दहेज लोभियों को मौजूदा कानूनों के अनुसार कड़ी से कड़ी सजा मिले इतना तो सुनिश्चित होना ही चाहिए। लोगों, खासकर युवाओं को सार्थक और ठोस पहल करनी चाहिए। अगर लड़के समझदार हों और बिकने को तैयार न हों तो काफी हद तक इस कुप्रथा पर अंकुश लग सकता है।

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