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खतरे साइबरबुलिंग के

खतरे साइबरबुलिंग के

मैसेजिंग, चैटिंग, फोटो और वीडियो डाउनलोडिंग, सर्चिग, म्यूजिक, मूवी..और भी न जाने क्या-क्या है इंटरनेट की दुनिया में। सिर्फ मनोरंजन ही नहीं ज्ञान का पूरा सागर है यह। यही वजह है कि बच्चों से लेकर बड़ों तक हर उम्र के लोगों के बीच नेट सर्फिग की उपयोगिता किसी-न-किसी रूप में सामने आई ही है। अब तो कंप्यूटर और लैपटॉप के अलावा सेलफोन भी नेट सर्फिग का साथी बन गया है। लेकिन इंटरनेट जिंदगी को अब नकारात्मक ढंग से भी प्रभावित करने लगा है। इसके माध्यम से अब साइबरबुलिंग एक नया खतरा बनकर जीवन में समाता चला जा रहा है, मुख्य रूप से किशोरों के जीवन में।

आखिर क्या है साइबरबुलिंग? जब इंटरनेट के द्वारा कंप्यूटर या सेलफोन के माध्यम से मैसेजिंग या ईमेज द्वारा किसी को लगातार परेशान किया जाए, तो यह साइबरबुलिंग कहलाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी किशोरों की करीब आधी संख्या किसी-न-किसी रूप में साइबरबुलिंग की शिकार है। मनोविशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर किसी को मारने-पीटने से भी अधिक होता है, क्योंकि यह व्यक्ति को भावनात्मक रूप से तोड़कर रख देता है। वह भय और नफरत के माहौल में जीता है और जिंदगी में भी उसकी दिलचस्पी कम होने लगती है।  साइबरबुलिंग के तहत या तो एक किशोर द्वारा दूसरे को सीधे मैसेजिंग  या ईमेजिंग द्वारा परेशान किया जाता है या छद्म रूप से दूसरे नाम से या किसी दूसरे की मदद से ऐसा किया जाता है।

यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें, तो अभी यहां स्थिति उतनी खराब नहीं हुई है कि किसी को ई-मेल, मैसेजिंग, ब्लॉग या किसी वेबसाइट के माध्यम से तंग किया जाए। पर इंटरनेट की लोकप्रियता जिस तेजी से यहां भी बढ़ रही है, उससे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि साइबरबुलिंग यहां भी किशोरों और युवाओं के जीवन में घर करने लगेगी। साइबरबुलिंग के दुष्परिणामों के मद्देनजर ही अमेरिका में इससे संबंधित कानून बनाए गए हैं। भारत में भी समय रहते इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।

सिर्फ लड़के ही नहीं, लड़कियां भी बड़ी संख्या में साइबरबुलिंग में संलग्न हैं। एक ऑस्ट्रेलियाई शोध के अनुसार, लड़कियां आमने-सामने कई बातें नहीं कह पातीं, इसलिए वे कई मामलों में लड़कों से भी आगे बढ़कर साइबरबुलिंग का सहारा लेती हैं। यहां वे आसानी से अपने मन की भड़ास निकाल डालती हैं। यही कारण है कि लड़कियां भी सोशल नेटवर्किग साइट पर अधिक-से-अधिक समय देती हैं।

कैसे बचें? सुरक्षित साइबर सर्फिग के लिए जरूरी है कि ऐसे मैसेज पर कोई ध्यान नहीं दिया जाए और साइट या मेल को ब्लॉक कर दिया जाए, जिससे ऐसे मैसेज आते हैं। इस संबंध में अपने दोस्तों या घर-परिवार के सदस्यों से बात जरूर करनी चाहिए। इंटरनेट सर्फिग में खुद के या अपने क्रेडिट कार्ड आदि के बारे में पूरी जानकारी किसी अंजान व्यक्ति को नहीं देनी चाहिए। अपना इंटरनेट पासवर्ड किसी के साथ शेयर न करें। यदि आप किसी को ऑनलाइन जनते हैं, तो उससे मिलने एकदम से न पहुंच जाएं। इससे भी बात न बने, तो साइबर क्राइम संबंधी पुलिस शाखा से अविलंब संपर्क करना चाहिए।

‘इस संबंध में लोगों में जगरूकता बढ़ानी होगी। खास तौर पर किशोरों को इस दृष्टिकोण से शिक्षित करना होगा। अभिभावकों को भी पता होना चाहिए कि उनके बच्चे नेट पर क्या कर रहे हैं और कहीं वे साइबरबुलिंग से त्रस्त तो नहीं। स्कूल प्रसाशन द्वारा इस संबंध में छात्रों को शिक्षित करना जरूरी है, ताकि न तो वे साइबरबुलिंग से परेशान हों और न ही दूसरों को परेशान करें।’ कहते हैं मनोविज्ञानी अरविंद मिश्र।

बेवजह या बदला लेने के लिए दूसरों को परेशान करने का काम अब कंप्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से भी होने लगा है। भले ही इसकी वजह कुछ भी हो सकती है, पर यह सच है कि इसके परिणाम अच्छे नहीं होते। किशोरों की जीवनशैली में इंटरनेट का यह नकारात्मक असर एक सच्चाई है।
मैसेजिंग, चैटिंग, फोटो और वीडियो डाउनलोडिंग, सर्चिग, म्यूजिक, मूवी..और भी न जाने क्या-क्या है इंटरनेट की दुनिया में। सिर्फ मनोरंजन ही नहीं ज्ञान का पूरा सागर है यह। यही वजह है कि बच्चों से लेकर बड़ों तक हर उम्र के लोगों के बीच नेट सर्फिग की उपयोगिता किसी-न-किसी रूप में सामने आई ही है। अब तो कंप्यूटर और लैपटॉप के अलावा सेलफोन भी नेट सर्फिग का साथी बन गया है। लेकिन इंटरनेट जिंदगी को अब नकारात्मक ढंग से भी प्रभावित करने लगा है। इसके माध्यम से अब साइबरबुलिंग एक नया खतरा बनकर जीवन में समाता चला जा रहा है, मुख्य रूप से किशोरों के जीवन में।

आखिर क्या है साइबरबुलिंग? जब इंटरनेट के द्वारा कंप्यूटर या सेलफोन के माध्यम से मैसेजिंग या ईमेज द्वारा किसी को लगातार परेशान किया जाए, तो यह साइबरबुलिंग कहलाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी किशोरों की करीब आधी संख्या किसी-न-किसी रूप में साइबरबुलिंग की शिकार है। मनोविशेषज्ञों का कहना है कि इसका असर किसी को मारने-पीटने से भी अधिक होता है, क्योंकि यह व्यक्ति को भावनात्मक रूप से तोड़कर रख देता है। वह भय और नफरत के माहौल में जीता है और जिंदगी में भी उसकी दिलचस्पी कम होने लगती है।  साइबरबुलिंग के तहत या तो एक किशोर द्वारा दूसरे को सीधे मैसेजिंग  या ईमेजिंग द्वारा परेशान किया जता है या छद्म रूप से दूसरे नाम से या किसी दूसरे की मदद से ऐसा किया जाता है।

यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें, तो अभी यहां स्थिति उतनी खराब नहीं हुई है कि किसी को ई-मेल, मैसेजिंग, ब्लॉग या किसी वेबसाइट के माध्यम से तंग किया जाए। पर इंटरनेट की लोकप्रियता जिस तेजी से यहां भी बढ़ रही है, उससे इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि साइबरबुलिंग यहां भी किशोरों और युवाओं के जीवन में घर करने लगेगी। साइबरबुलिंग के दुष्परिणामों के मद्देनजर ही अमेरिका में इससे संबंधित कानून बनाए गए हैं। भारत में भी समय रहते इस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।

सिर्फ लड़के ही नहीं, लड़कियां भी बड़ी संख्या में साइबरबुलिंग में संलग्न हैं। एक ऑस्ट्रेलियाई शोध के अनुसार, लड़कियां आमने-सामने कई बातें नहीं कह पातीं, इसलिए वे कई मामलों में लड़कों से भी आगे बढ़कर साइबरबुलिंग का सहारा लेती हैं। यहां वे आसानी से अपने मन की भड़ास निकाल डालती हैं। यही कारण है कि लड़कियां भी सोशल नेटवर्किग साइट पर अधिक-से-अधिक समय देती हैं।

कैसे बचें? सुरक्षित साइबर सर्फिग के लिए जरूरी है कि ऐसे मैसेज पर कोई ध्यान नहीं दिया जाए और साइट या मेल को ब्लॉक कर दिया जाए, जिससे ऐसे मैसेज आते हैं। इस संबंध में अपने दोस्तों या घर-परिवार के सदस्यों से बात जरूर करनी चाहिए। इंटरनेट सर्फिग में खुद के या अपने क्रेडिट कार्ड आदि के बारे में पूरी जानकारी किसी अंजान व्यक्ति को नहीं देनी चाहिए। अपना इंटरनेट पासवर्ड किसी के साथ शेयर न करें। यदि आप किसी को ऑनलाइन जनते हैं, तो उससे मिलने एकदम से न पहुंच जाएं। इससे भी बात न बने, तो साइबर क्राइम संबंधी पुलिस शाखा से अविलंब संपर्क करना चाहिए।

‘इस संबंध में लोगों में जगरूकता बढ़ानी होगी। खास तौर पर किशोरों को इस दृष्टिकोण से शिक्षित करना होगा। अभिभावकों को भी पता होना चाहिए कि उनके बच्चे नेट पर क्या कर रहे हैं और कहीं वे साइबरबुलिंग से त्रस्त तो नहीं। स्कूल प्रसाशन द्वारा इस संबंध में छात्रों को शिक्षित करना जरूरी है, ताकि न तो वे साइबरबुलिंग से परेशान हों और न ही दूसरों को परेशान करें।’ कहते हैं मनोविज्ञानी अरविंद मिश्र।

बेवजह या बदला लेने के लिए दूसरों को परेशान करने का काम अब कंप्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से भी होने लगा है। भले ही इसकी वजह कुछ भी हो सकती है, पर यह सच है कि इसके परिणाम अच्छे नहीं होते। किशोरों की जीवनशैली में इंटरनेट का यह नकारात्मक असर एक सच्चाई है।

खतरे साइबरबुलिंग के
साइबरबुलिंग का संबंध किशोरों के ऑनलाइन व्यवहार से है, जो इसके शिकार को भावनात्मक रूप से तोड़कर रख देता है।
अमेरिका में साइबरबुलिंग से संबंधित कानून बनाए गए हैं, क्योंकि वहां आधे से ज्यादा किशोर इसकी चपेट में हैं।
सिर्फ लड़के नहीं , बल्कि लड़कियां भी बड़ी संख्या में साइबरबुलिंग में संलग्न हैं।
बड़े भी जब साइबरबुलिंग में शामिल हो जाते हैं, तब उसके लिए साइबरस्टॉकिंग शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। 
ब्लॉगिंग का इस्तेमाल भी इसके लिए किया जाने लगा है।

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