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मुश्किल नहीं है तालिबान को हराना

तालिबान को हराना यूँ तो एक बेहद मुश्किल काम नजर आता है, पर वह अजीब किस्म से आसान भी है। पाकिस्तानी सेना अपनी बड़ी बटालियनें उधर मोड़ कर स्वात घाटी से सत्रह लाख सिविलियनों को विस्थापित कर दे, और फिर जब घाटी में पैठ बनाए तालिबान पारंपरिक तौर पर छोटी-छोटी टुकड़ियों में बँट जएं तो उन्हें पलीता लगाकर ध्वस्त कर दिया जए! यह गलती तालिबान ने उस वक्त की थी जब वह अफगानिस्तान में हुकूमत की फौज के रूप में तैनात थे और उसकी टुकड़ियों को रूसियों ने बेहतर हथियारों और हवाई हमलों से भून कर रख दिया था। विगत बताता है कि तालिबान जहाँ खुले में लड़ने को उतरे, वे आसानी से जिबह हो जते हैं। और स्वात में निर्दोष नागरिकों के घर-बदर कर दिए जने के बाद अब वे सूनी घाटियों में खुले में आते ही मारे जने लगें हैं।

इससे तीन रोचक बातें उजगर होती हैं। एक, कि तालिबान लड़ाई के दौरान घेरेबंदी और चतुर व्यूह रचना में अनाड़ी मूर्ख हैं। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि उनका नेतृत्व भी नितांत मूर्ख है। दूसरी बात यह, कि अमेरिका द्वारा यह दावा, कि तालिबान के जनूनी जत्थे पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार पर कब्ज कर लेंगे, अमेरिका को भी उतना ही बड़ा मूर्ख प्रमाणित करता है। पर तीसरी बात उम्मीद कायम रखने की इन दोनों से भी बड़ी वजह है। हम जब कभी भी तालिबान (या अलकायदा) के बारे में लिखते हैं, तो हम यह कहकर अपने को छलते हैं कि वे एक चालकानुवर्ती और बेहद चुस्त-कुशल युद्ध की मशीन हैं। कुछ इसी किस्म की छलना हम अफगानिस्तान के विषय में लिखते वक्त भी पाले रहे हैं, जब हम उसे उजड्ड और अराजक कबायली जत्थों की मध्यकालीन मानसिकता वाला देश मानने की बजए सुरम्य स्विट्जरलैण्ड सरीखी जगह कह कर व्याख्यायित करने लगते हैं। पाकिस्तान के तालिबान कौन हैं? इनमें कई तो वे अफगानी विस्थापित हैं, जिन्होंने रूसी घुसपैठ के बाद अफगानिस्तान से भाग कर पाकिस्तान में शरण ली और रूसियों की विदाई के बाद भी वापस नहीं लौटे। कुछ ऐसे पाकिस्तानी नागरिक हैं, जो कट्टरपंथिता की ओर मुड़ गए हैं। और कुछ का पेशा दबंगई से दूसरों के लिए पैसा लेकर उगाही करना रहा है। कुछ उत्तरी विदेशी हैं जो पू. यूरोप में सोवियत रूस के विघटन के बाद उभरे नाना ‘स्तानों’ से ओसामा बिन लादेन की पतनशील पश्चिम तथा रियाध की कठपुतली सरकार विरोधी मुहिम में भाग लेने चले आए हैं। इन सब धड़ों में न तो कोई स्पष्ट आपसी तालमेल है, न ही एक स्थायी समवेत मुहिम छेड़ने लायक दृष्टि। स्वात की घाटी में पैठे ये तालिबान अब लगातार खत्म हो रहे हैं, क्योंकि वे स्थानीयजनता की सहानुभूति के पात्र नहीं हैं और वह उन्हेंकोई मदद नहीं देती।  निश्चय ही यह एक मानवीय त्रासदी भी है, लेकिन हाल का घटनाक्रम स्पष्ट करता है कि स्वात घाटी में तालिबान की हैसियत एक अनचाहे, बिनबुलाए मेहमान बने बाहरिया जत्थे की है, जिसे स्थानीय सिविलियन आबादी ने अपने हाल पर छोड़ दिया है।

पाकिस्तान में धुर दक्षिणपंथी धर्मिक धड़े भी एक भारी ज्वार नहीं हैं। वे सीमित रूप में सिर्फ पंजाब तथा सिंध में मौजूद हैं। उत्तर पूर्वी सीमांत क्षेत्र में उनके दोस्त कम दुश्मन ही ज्यादा हैं। और जहाँ तक बलूचिस्तान का सवाल है, वह उजड्ड अराजक कबीलों का इलाका है जो सबसे बड़ी रकम देने वाले के साथ हो लेगा, पर इसी शर्त पर, कि उसे किसी नियम कानून का पालन करने को नहीं कहा जएगा। अगर युद्ध का लक्ष्य स्पष्ट हो तो बलूचों को हराना कठिन नहीं होगा। पर पाकिस्तान के साथ दिक्कत यह है कि पिछले तीन दशकों से उसके आगे अपने लक्ष्य स्पष्ट नहीं रहे हैं। इसके साथ ही उसकी सेना के मन में भारत विरोध एक कुतर्की जुनून बन कर पैठा हुआ है, और वह येन-केन दिल्ली और काबुल के रिश्तों को पलीता लगाने में ही सारी ऊज्र लगाए रहती है। या फिर अमेरिका से अपना उल्लू सीधा करने में। वहाँ की कमजोर भ्रष्ट सरकारें, वे चाहे सैन्य चालित हों या सिविलियन, हमेशा ताकत पाकर अपना ही घोंसला जल्द भरने की फिराक में रहती आई हैं। न वहाँ गरीबी घट रही है, न ही जनसंख्या।

पर अब देखें। आतंकी वहाँ आएदिन छिप-छिपकर मनचाहे लक्ष्य चुन कर वहाँ के आबादी बहुल शहरों में जब चाहे घातक विस्फोट कर रहे हैं। यदि वे उजले में बाहर खदेड़ दिए जएं तो उनका सफाया आसानी से हो सकता है। मुल्लाओं की कोई जंगलूस टीम वहाँ सत्ता हथियाने नहीं ज रही। उनके खुद अपने तौर-तरीकों ने उन्हें उस जनता से अलग-थलग कर डाला है, जिसे वे अपनी ओर खींचना चाहते हैं। मुसलमानों के लिए मुसलमानों द्वारा गढ़े गए इस राज्य में  शरिया कानून और एक जनप्रिय व्यवस्था के बीच भी भारी खाई बनी हुई है।

तो क्या इसका यह अर्थ है कि पाक से एक छिद्रमय सीमा के परे खड़े अफगानिस्तान को लेकर भी बेहतरी की आशा की ज सकती है? नहीं। दोनों देशों के बीच गहरा अंतर है। और पाकिस्तान के जनरलों और झगड़ालू राजनेताओं को भी अभी से बधाई दे देना जल्दबाजी ही होगी। उन्होंने अपने भीतरी शत्रु का संज्ञान लेने से पहले जने कितने बरस गँवा दिए हैं। पर अब वे जो कदम उठा रहे हैं, उनका असर दिखाई देने लगा है। वे अब जकर तालिबान के खतरे को एक समस्या की तरह देख और दिखा रहे हैं- और इस तरह अब पाकिस्तान तालिबान समस्या के हिस्से की बजाए उसे सुलझने की प्रक्रिया का अंग बन चला है।

लेखक प्रसिद्ध ब्रिटिश पत्रकार हैं। वे दि गाजिर्यन के संपादक रह चुके हैं

(दि गाजिर्यन से साभार)

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