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मंत्रिमंडलः प्रधानमंत्री पद का अवमूल्यन

विवाद इस बार भी खड़ा हुआ। यह ठीक है कि इस बार क्षेत्रीय दल मंत्रिमंडल में जगह पाने के लिए पहले की तरह जोरदार सौदेबाजी नहीं कर सके। लेकिन जिस तरह से मंत्रिमंडल के गठन में देरी हुई, उसने कई सवाल तो खड़े किए ही। मंत्रिमंडल के लिए सहयोगियों का चयन हमेशा ही प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार माना जता है। इसीलिए ऐसी कोई भी सौदबाजी प्रधानमंत्री के पद की गरिमा का अवमूल्यन करती है।

गठंबधन सरकार में प्रधानमंत्री का यह विषेशाधिकार बुरी तरह प्रभावित होता है, क्योंकि क्षेत्रीय मठाधीश यह तय करते हैं कि मंत्रिमंडल में उनके दल का नेतृत्व कौन-कौन करेंगे और यह भी कि उन्हें कौन-कौन विभाग दिए जाएंगे। ममता बनर्जी की नज़र बहुत दिनों से रेल मंत्रालय पर टिकी थी और इसे उन्होंने अंतत: पा लिया। इसी तरह करुणानिधि ने न सिर्फ कैबिनेट में एक खास संख्या हिस्से के रूप में मांगी बल्कि निश्चित विभाग भी मांगे। गठबंधन सरकार की मज़बूरी के चलते प्रधानमंत्री को उनकी बात माननी पड़ी।

संसदीय लोकतंत्र मंत्रिपरिषद की सदन के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी की अवधारणा पर आधारित है। सामूहिक जिम्मेदारी की अवधारणा तभी सार्थक हो सकती है, जब प्रधानमंत्री को मंत्री का चयन और बर्खास्त करने का पूरा अधिकार हो।

संविधान सभी में इसकी ज़रूरत पर बल देते हुए भीमराव आंबेडकर ने कहा था, ‘मान लीजिए कोई प्रधानमंत्री नहीं है, तो सचमुच क्या होगा? होगा यह कि हर मंत्री राष्ट्रपति के नियंत्रण या प्रभाव में रहेगा। यह राष्ट्रपति के लिए पूरी तरह मुमकिन होगा, जो मंत्रिमंडल के अंग नहीं हैं, कि वह हर मंत्री से अलग-अलग सम्बंध रखें, उन्हें प्रभावित करें और इस प्रकार कैबिनेट के अन्दर तोड़फोड़ मचा दें। ऐसी स्थिति की कल्पना करना असंभव नहीं है।

जब तक ब्रिटिश संसद में सामूहिक जवाबदेही की प्रथा नहीं शुरू हुई, तब तक आपको याद होगा कैसे अंग्रेजी राजा ब्रिटिश कैबिनेट को तहस-नहस करता था। उसके पास मंत्रिमंडल और संसद दोनों में राजा के दोस्तों की एक पार्टी होती थी। यह चीज़ सामूहिक जिम्मेदारी के कारण ख़त्म हुई। इसलिए, प्रधान मंत्री मंत्रिमंडल के मेहराब का मुख्य पत्थर है और जब तक हम वह पद नहीं बनाते हैं तथा मंत्रियों को नियुक्त और बर्खास्त करने की शक्ित उस पद में नहीं देते हैं तब तक कोई सामूहिक जिम्मेदारी नहीं हो सकती है।

ब्रिटेन की वेस्टमिंस्टर व्यवस्था भारत ने अपनायी है, किंतु वहाँ करीब 150 वर्षों तक प्रधानमंत्री का पद बिना किसी कानूनी आधार के काम करता रहा। मध्य युग में राजा के सलाहकार हुआ करते थे। राजा के पक्ष में पार्षदों का एक समूह होता था, जो संसद एवं अदालत से भिन्न था। राजा इन्हें अपनी मर्जी से बर्खास्त कर सकता था। प्रसिद्घ ब्रिटिश न्यायविद एफ़ डब्ल्यू मेटलैंड ने लिखा है,- वे अक्सर मिलते हैं। उनकी बैठक में सामान्य तौर पर राजा नहीं उपस्थित होता है। वे राजा अपनी प्रतिभा और सूझबूझ से जो सवरेत्तम लगता है, परामर्श देते हैं। यह ज़रूरी नहीं था कि राजा उसकी सलाह माने या मांगे। यह 15वीं सदी के प्रारंभ की स्थिति थी। यही परिषद कैबिनेट के रूप में विकसित हुई।

प्रधानमंत्री का पद 18वीं शताब्दी में सृजित हुआ जब हैनोवेरियन वंश के जर्मन भाषी सम्राटों ने कैबिनेट की बैठक में कोई दिलचस्पी नहीं ली। तब कैबिनेट की अध्यक्षता प्रधानमंत्री करने लगा। हालांकि 18वीं शताब्दी के दूसरे दशक के अंत तक जॉर्ज प्रथम या उनकी अनुपस्थिति में उनका पुत्र मंत्रिमंडल की बैठकों की अध्यक्षता करता था।

इसलिए ब्रिटेन से अलग भारत में प्रधानमंत्री पद का सृजन ही संविधान द्वारा हुआ, जिसमें उसे कुछ विशेषाधिकार दिये गये। अगस्त 1946 में जब अंतरिम सरकार का गठन हुआ, तब जवाहरलाल नेहरु उसके मुखिया बने किंतु उन्हें प्रधानमंत्री नहीं, उन्हें वायसराय की कार्यकारी परिषद का उपाध्यक्ष बनाया गया। प्रथम मंत्रिमंडल में भी मंत्रियों के चयन में केवल नेहरु की भूमिका नहीं थी। सरदार पटेल की सलाह पर सी़ एच़ भाभा, श्यामा प्रसाद मुकर्जी, भीमराव आंबेडकर, क्षणमुखम चेट्टी जैसे गै़र-कांग्रेसी और एऩ वी. गाडगिल को मंत्रिमण्डल में शामिल किया गया था। वह नेहरु का मंत्रिमंडल न कहलाकर नेहरु-पटेल का मंत्रिमंडल कहलाता था।

बाद में नेहरु तथा पटेल के बीच प्रधानमंत्री की शक्तियों को लेकर विवाद भी हुआ। पटेल प्रधानमंत्री को बराबरी वालों में पहला मानते थे, जबकि नेहरु का मानना था कि प्रधानमंत्री का पद अन्य मंत्रियों से भिन्न है और यह पर्यवेक्षक की तरह है। पटेल की मृत्यु के बाद यह विवाद आगे नहीं बढ़ा और मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री की विशिष्ट स्थिति स्वीकार कर ली गयी। इसका यह अर्थ नहीं कि प्रधानमंत्री तानाशाह की तरह काम करेगा। अन्य वरिष्ठ नेताओं की सलाह का असर तो प्रधानमंत्री के ऊपर होता ही है, परंतु अपने अधिकार के प्रयोग में उसे बंधा महसूस नहीं करना चाहिए।

लेखक टीवी पत्रकार हैं

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