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विशालता की ओरख

वेद कहते हैं एकं सदविप्रा बहुधा वदन्ति अर्थात एक ही ईश्वर को विज्ञजन विभिन्न नामों से पुकारते है। एकोùहम् बहुस्यामि का ईश्वरीय उद्घोष इस ओर इंगित करता है कि यह संसार इसी परमात्मा का प्रारूप है। बाईबल का कहना है परमेश्वर एक है, जो निराकार और ज्योतिस्वरूप है। यहूदी मतानुसार ईश्वर एक निराकार तथा संपूर्ण ब्रहमांण का सृजेता, सृष्टि का पिता है। पारसी धर्म में भी ईश्वर को एक तथा अहूरमज्द (सर्वशक्तिमान) बताया है।

श्री मद्भागवत में भी कहा है कि जैसे विभिन्न ज्ञानेद्रियां एक ही वस्तु में अलग-अलग गुण अनुभव करती है, उसी प्रकार विभिन्न धर्मशास्त्र एक परमेश्वर के अनेक पक्षों की ओर इंगित करते हैं।

चीन में कन्फयूशियसवाद, ताओवाद और बौद्ध धर्म के अनुयायी जब परस्पर मिल कर अपने-अपने धर्म की प्रशंसा करते है, तब सभा के अंत में मिल कर कहते है धर्म अनेक हैं, पर तर्कना एक है, हम सभी भाई-भाई है। महात्मा जरथुस्त्र कहते है हम संसार के नीतिपरायण प्राचीन धर्मो की पूजा करते है।

अशोक ने घोषणा की थी, जो मनुष्य अपने धार्मिक संप्रदाय के मोह में पड़ कर गौरव वृद्घि की इच्छा से दूसरे धर्म संप्रदायों की निन्दा करता है और केवल अपने धर्म संप्रदाय के प्रति सम्मान प्रकट करता है, वह वास्तव में अपने इस आचरण से अपने ही संप्रदाय की भारी क्षति पहुंचाता है। इसलिए दूसरे लोगों द्वारा स्वीकृत धर्म निष्ठा के विधि नियम के प्रति स्वेच्छया सद्भाव रखना सरहानीय है।

जिन लोगों में उदात्त शक्ति की कमी है और जो परस्पर साहचर्य से नहीं रह पाते या तो नष्ट हो जाते हैं या हीनता निरादर की स्थिति में जीवित रहते है। केवल वे लोग जिन में सहयोग की दृढ़ भावना रहती है, स्वंय जीवित रहते हैं और सभ्यता की उन्नति करते है। आज की सदी में हम में से प्रत्येक को अपने अंदर छिपी असामान्यता को पहचान कर विश्व समाज के एक नागरिक के रूप में रहना सीखना होगा।

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