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दिन के व्रत त्योहार इस प्रकार से हैं....

सूर्य : वृष राशि में, चंद्रमा : सिंह राशि में, बुध : मेष राशि में, शुक्र : मेष राशि में, मंगल : मेष राशि में, वृहस्पति : कुंभ राशि में, शनि :  सिंह राशि में, राहु : मकर राशि में, केतु : कर्क राशि में।
31 मई, रविवार, 10 ज्येष्ठ (सौर) 1931, ज्येष्ठ मास 17 प्रविष्टे 2066, 6 जमादिल आखिर 1430, ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी रात्रि 8 बजकर 14 मिनट तक उपरान्त नवमी, पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र रात्रि 4 बजकर 1 मिनट तक तदनन्तर उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र, हर्षण योग सायं 5 बजकर 5 मिनट तक पश्चात वज्र योग, विष्टि (भद्रा) करण प्रात: 8 बजकर 52 मिनट तक, चन्द्रमा सिंह राशि में (दिन-रात)।  

(31 मई से 6 जून तक)
31 मई (रविवार) को श्री दुर्गाष्टमी व्रत। अष्टमी तिथि में शुक्लादेवी का आवाहन। धूमावती जयंती। मेला क्षीर भवानी (कश्मीर)।
दुर्गाष्टमी : ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की अष्टमी को शिवजी का और शुक्लादेवी का यथा विधि से पूज करते हैं। शुक्लादेवी ने जब दानवों का संहार किया था, तब देवताओं ने इनकी पूजा की थी। अत: आपत्तियों की निवृत्ति के लिए मनुष्यों को भी यह व्रत करना चाहिए।

1 जून (सोमवार) को नवमी में उपोषण करके शुक्लादेवी का पूजन आदि है।
2 जून (मंगलवार) को गंगा दशमी, श्री गंगा दशहरा, गंगा जन्म लग्न वृष, दस दिनात्मक गंगा दशहरा व्रत समाप्त, सेतु बंध श्रारामेश्वर प्रतिष्ठा दिवस, श्री रामेश्वर यात्रा, दर्शन पूजा। बटुक भैरव जयंती।
3 जून (बुधवार) को निजर्ला एकादशी व्रत सबका। भीमसेनी एकादशी। काशी के दशाश्वमेध घाट से Þाी विश्वनाथ मन्दिर तक कलश यात्रा, दर्शन एवं पूजन। गायत्री जयंती। रुक्मिणी विवाह (उड़ीसा)।
4 जून (बृहस्पतिवार) को चम्पक द्वादशी तथा द्वादशी में त्रिविक्रम पूज आदि व्रत हैं।
5 जून (शुक्रवार) को प्रदोष व्रत। दाक्षिणात्यों का त्रिदिनात्मक वट सावित्री व्रतारम्भ। दाक्षिणात्यों के वट सावित्री का प्रथम संयम।
प्रदोष व्रत : जो व्रती प्रदोष के समय शंकर जी के चरण कमल की अनन्य मन से पूज करता है, उसके धन-धान्य, स्त्री-पुत्र, बन्धु-बांधव तथा सुख-सम्पत्ति हमेशा बढ़ते रहते हैं।
6 जून (शनिवार) को दाक्षिणात्यों के वट सावित्री व्रत का द्वितीया संयम आदि है। 

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