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कुड़ियों पर डाल रहीं डोरे.....तम्बाकू कम्पनियां

कुड़ियों पर डाल रहीं डोरे.....तम्बाकू कम्पनियां

मृणाल पाण्डे

तम्बाकू कंपनियों के निशाने पर लड़कियां और महिलाएं एक अर्से से रही हैं। शुरुआत हुई सबसे पहले 1920 में अमेरिका में, जब वहां इस तरह के विज्ञापन छपने लगे थे, जिसमें सिगरेट पी रहे पुरुष के गिर्द सुंदरियों की भीड़ दिखा सिगरेट पीना मर्दानगी की शान और लड़कियों को पटाने का अचूक नुस्खा बताया गया था। 1927 तक महिलाओं की पत्रिकाओं में भी सिगरेटों के ऐसे विज्ञापन छपने लगे थे, जिनमें उन्हें वजन पर काबू रखने का एक आसान तरीका बताया गया था। लकी स्ट्राइक्स सिगरेटों का विज्ञापन औरतों से कहता था कि मीठा खाने की बजए एक सिगरेट सुलगा लो (रीच फॉर लकी स्ट्राइक इनस्टैड ऑफ ए स्वीट)। दूसरे विश्वयुद्ध में जब जरूरत पड़ी और औरतों की पारंपरिक कामों के अलावा सेना में भी भर्ती होने लगी तो सिगरेट निर्माताओं ने हवाई उड़ाके की वेशभूषा में एक मर्दाना छवि की औरत को सराहना के इन शब्दों के साथ पेश किया, ‘उसमें है वह सब जो कि जरूरी है’ (शी हैज व्हॉट इट टेक्स)। कैमल सिगरेट निर्माताओं ने अपने विज्ञापनों में औरतों का सिगरेट पीना उनके भद्र, सुसंस्कृत और स्मार्ट होने का प्रमाण बताना शुरू कर दिया।

1970 के दशक तक औरतें भी पुरुषों की ही तरह भ्रामक विज्ञापनों के मोहपाश में बंध चली थीं। इसे भांप कर सिगरेट कंपनियों ने  ‘लो-टार’, ‘स्लिम’ और ‘लाइट’ सिगरेटें ‘सिर्फ आपके लिए’ कह कर महिलाओं के आगे पेश कर दीं। अब विज्ञापनों में नारीवाद के फिकरों का चतुर इस्तेमाल कर यह प्रमाणित किया जने लगा कि सिगरेट पीना-पिलाना नारी-मुक्ति का परचम लहराना है। ‘वर्जीनिया स्लिम’ ब्रांड का एक विज्ञापन इन दिनों खूब छपा, जिसमें एक पुरातनपंथी दब्बू गृहिणी के साथ एक आकर्षक हँसमुख स्त्री की छवि थी और कहा गया था, ‘यू हैव कम अ लॉग वे बेबी!’ (मुन्नी, तू तो बहुत आगे निकल आई है!)

नतीजा : 1968 से 1977 के बीच सिगरेट पीने वाली किशोरियों की तादाद में 110 प्रतिशत की वृद्धि।

सफलता से हुमक कर कंपनियों ने और भी पंजे फैलाए। पर जब 90 के दशक में यह अकाट्य तौर से साबित हो गया कि सिगरेट पीने का सीधा संबंध मुंह, गले और फेफड़े के कैंसर से, हृदयाघात से और गर्भपात से होता है, तो सरकार पर डॉक्टरों और उपभोक्ता संरक्षक समूहों का दबाव बढ़ा कि इस पर रोक लगे।  1999 में एक सर्वप्रांतीय समझौता किया गया जिसके तहत तय हुआ कि सिगरेट के हर पैकेट पर डॉक्टरी चेतावनी प्रमुखता से छापी जाए।

पर सिगरेट कंपनियों ने इसकी भी काट खोज ली। उन्होंने विज्ञापनों पर खर्चा 8.4 बिलियन डॉलर कर दिया, और 22.3 प्रतिशत अन्य नई स्मोकर किशोरियों को ग्राहक बनाने में सफल रहे। 2001 में इन कंपनियों ने यह खर्च 11.4 बिलियन डॉलर कर दिया। नतीज? औरतों और पुरुषों में स्मोकर्स की तादाद बराबर हो गई।

अब चूंकि अधिक पढ़े-लिखे, सम्पन्न और जगरुक वर्ग (जो श्वेत-बहुल है) में पुरुष-स्त्रियां बड़ी तादाद में सिगरेटें त्याग रही हैं, कंपनियों का नया टार्गेट हैं, विकसित देशों की स्पेनी और अश्वेत आबादी और विकासशील देश, जहां तंबाकू के विष की बाबत जरूरी जनकारी अभी बहुत दूर तक नहीं फैल पाई है। भारत के शहरों में इसी वजह से पिछले दशक में कैम्पस पर सिगरेट पीने वाली लड़कियों की तादाद तेजी से बढ़ी है।
पर क्या हम अपनी अमेरिकी बहनों के अनुभव को अपने स्वास्थ्य की कीमत पर नजरअंदाज कर सकते हैं?

अब चूंकि अधिक पढ़े-लिखे, सम्पन्न और जगरुक वर्ग (जो श्वेत-बहुल है) में पुरुष-स्त्रियां बड़ी तादाद में सिगरेटें त्याग रहे हैं। कंपनियों का नया टार्गेट हैं, विकसित देशों की स्पेनी और अश्वेत आबादी और विकासशील देश, जहां तम्बाकू के विष की बाबत जरूरी जनकारी अभी बहुत दूर तक नहीं फैल पाई है। भारत के शहरों में इसी वजह से पिछले दशक में कैम्पस पर सिगरेट पीने वाली लड़कियों की तादाद तेजी से बढ़ी है।

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