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जदयू-कांग्रेस दोस्ती में कई अगर-मगर

ांग्रेस की सदिच्छा के बावजूद यूपीए की केंद्र सरकार को जदयू का समर्थन मिलना बहुत आसान नहीं है। सबसे बड़ी वजह बिहार में सरकार चलाने के लिए जदयू की भाजपा पर निर्भरता है। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 122 सदस्यों का समर्थन चाहिए। भाजपा के 55 विधायकों की मदद से राज्य सरकार चल रही है। यह संभव नहीं है कि जदयू केंद्र में यूपीए की सरकार की मदद कर और बिहार में भाजपा की मदद से सरकार चलाए। कांग्रेस ने जदयू के सामने विकल्प रखा है-अगर विधानसभा चुनाव का जोखिम उठाना चाहते हैं तो यूपीए की सरकार में शामिल होइए। यह प्रस्ताव कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव पृथ्वीराज चौहान ने शनिवार को परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद दिया था। जदयू ने आधिकारिक तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। श्री चौहान 10 जनपथ और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से संबद्ध हैं। इसलिए उनके प्रस्ताव को हल्के में नहीं लिया जा रहा है। माना जा रहा है कि सोनिया-मनमोहन की सहमति से ही चौहान ने प्रस्ताव दिया होगा।ड्ढr ड्ढr जदयू के एक हिस्से में भी नई रणनीति बनाने के लिए नेतृत्व पर दबाव बन रहा है। तर्क यह कि पांच साल अगर केंद्र में मददगार सरकार नहीं रही तो राज्य में विकास की रफ्तार को जारी रखने में परशानी होगी। भाजपा के पास भले ही राष्ट्रीय मुद्दा हो, जदयू के खाते में तो बिहार ही सबसे महत्वपूर्ण है। भाजपा के साथ पुराने रिश्ते को लेकर भी जदयू के एक हिस्से में दुविधा है। यह भावनात्मक रिश्ता है। इसी रिश्ते से शून्य से शिखर तक का सफर पूरा हुआ है।ड्ढr दरअसल, जदयू का नेतृत्व तुरंत विधानसभा चुनाव कराने से बचना चाहता है। कांग्रेस को समर्थन देनेवाला खेमा बगैर चुनाव के ही सरकार बनाए रखने के लिए समर्थन जुटा लेने का दावा कर रहा है। जदयू की उपलब्धियों को देखते हुए संभव भी है। दूसर दलों के हताश विधायक जदयू में जा सकते हैं। मगर सबसे बड़ी बाधा यह आ सकती है कि जदयू उस सरकार को कैसे समर्थन देगा जिसमें राजद और लोजपा के लोग भी शामिल रहेंगे।

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