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दोराब टाटा ने नेताजी से क्या वादा किया था?

टाटा समूह के चेयरमैन और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बीच लम्बे पत्र-व्यवहार हुआ करते थे। नेता जी उन्हें यह समझाने की चेष्टा करते थे कि टिस्को (अब टाटा स्टील) में मजदूरों के हकों में माहौल बनाकर वे बाकी कंपनियों के लिए एक बेहतरीन मिसाल कायम करेंगे। उधर, दोराब टाटा का दावा रहता था कि उनके समूह की इस महत्वपूर्ण कम्पनी में सब कुछ सामान्य तरीके से चल रहा है और उनके हकों की रक्षा की जा रही है। ये बातें हैं 1ी। उन दिनों टिस्को में मजदूर प्रबंधन पर छंटाई का आरोप लगा रहे थे। टिस्को में स्थिति खासी तनावपूर्ण बनी हुई थी। मजदूर टिस्को के जनरल मैनेजर एन.बी. सकलातवाला के व्यवहार से काफी खफा थे। तब तक नेता जी स्थापित मजदूर नेता बन चुके थे। वे बंगाल की कई जूट और दूसरी मिलों मंे मजदूरों के हक में लड़ रहे थे। वे टिस्को के मजदूरों के आमंत्रण पर वे जमशेदपुर गए। वहां पर उन्हें 1में ही टिस्को यूनियन का अध्यक्ष चुन लिया गया। उनके आहवान पर टिस्को में हड़ताल हुई। लम्बी बातचीत के बाद 12 सितम्बर 1ो प्रबंधन और मजदूरों में समझौता हो गया। उसके बाद कहते हैं कि इधर प्रबंधन और मजदूरों के रिश्ते बेहतरीन बन गए। फिर कभी इधर हड़ताल नहीं हुई। हड़ताल खत्म होने से पहले दोराब टाटा ने नेताजी से वादा किया था कि इधर मजदूरों के हकोों के साथ कभी खिलवाड़ नहीं होगी। नेता जी 1में ऑल इंडिया ट्रेेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष भी चुने गए थे। हालांकि वे 1से ही मजदूरों के हितों और हकों के लिए सक्रिय हो गए थे। मजदूर आंदोलन की तरफ उन्हें खींचा उनके राजनीतिक गुरु महान स्वाधीनता सेनानी देशबंधु चितरंजन दास ने। फारवर्ड ब्लाक के नेता प्रो. बरून मुखर्जी ने बताया कि नेताजी ने बतौर मजदूर नेता बंगाल और बिहार के अनेक शहरों में सघन दौरे किए। अपनी सभाओं में इस बात को जोर देकर कहा करते थे कि अगर फैक्ट्री का स्वामी मजदूरों का शोषण करेगा तो उसका विरोध किया जाएगा। उस हालत में यह नहीं देखा जाएगा कि वह भारतीय है या अंग्रेज। दरअसल उन दिनों कलकत्ता में खासतौर पर जूट मिलों का स्वामित्व अंग्रेजों के हाथों में ही था। नेता जी ने जमशेदपुर में टिस्को के बाद टिनप्लेट नाम की कम्पनी के मजदूरों के हकों में संघर्ष करके उन्हें उनका जायज हक दिलवाया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के 1े बाद की गतिविधियों का अध्ययन करने से मालूम चल जाएगा कि वे इस दौरान झारखंड क्षेत्र में स्थित विभिन्न कोयला और आयरन ओर माइंस में नारकीय स्थितियों में काम करने वाले श्रमिकों के बीच में भी नियमित रूप से जाने लगे।

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