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अफ्रीकी अफसरों नहीं मिल रहे घर

राजधानी के रीयल एस्टेट बाजार में इन दिनों रंगभेद नीति खुलकर अपनाई जा रही है। इधर काम करने वाले विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी)तथा दूतावासों से जुड़े हुए अफ्रीकी मूल के राजनयिकों और अधिकारियों को किराए का घर लेने के लिए भारी दिक्कतों से दो-चार होना पड़ रहा है। हालत यह है कि अमेरिका और यूरोप के देशों के अफ्रीकी मूल के नागरिकों को भी घर मिलने में तमाम तरह की कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें भी पहले अफ्रीकी ही माना जाता है। उधर, जिम्बाव्वे तथा दक्षिण अफ्रीका के गोरे नागरिकों को अफ्रीका के देशों से संबंध रखने के बावजूद भी किराए के घर दक्षिण दिल्ली में मिल जाते हैं। राजनयिकों और एमएनसी के अधिकारियों को किराए पर घर दिलवाने वाली एजेंसी मैक रीयलटर्स की काजोल माखीजानी ने कहा कि हाल के दौर में जिस तरह से अफ्रीकी नागरिकों के राजधानी तथा देश ेके अन्य भागों में नशीले पदार्थो के कारोबार में लिप्त होने के मामले बढ़े हैं, उसी रोशनी में ही सम्भवत: मकान मालिकों ने अफ्रीकियों से दूरियां बढ़ा ली हैं। खबर है कि कई बार अफ्रीकि यों को घर उस हालत में मिलता है जबकि ये एक साल का किराया एडवांस में ही अदा कर देते हैं। इन्हें घर देने से पहले मकान मालिक तमाम तरह की शर्ते इनके सामने रख देते हैं। जैसे कि ये घर में तेज आवाज में संगीत नहीं सुनेंगे और देर रात तक नाच गाने में मशगूल नहीं रहेंगे। सनद रहे कि राजधानी में वर्तमान में करीब तीन हजार अफ्रीकी मूल के राजनयिक और एमएनसी से जुड़े हुए अधिकारी रहते हैं। अगर इनमें यहां पर पढ़ने वाले विद्यार्थियों को भी जोड़ लिया जाए तो यह आंकड़ा काफी बढ़ जाएगा। प्रमुख रीयल एस्टेट सलाहकार एजेंसी सैंचुरी 21 के वाइस प्रेसिडेंट अजय राठौड़ ने भी बताया कि अफ्रीकियों को लेकर माहौल बदलने में केन्या और उससे पहले युगांडा में हुई घटनाओं की भी भूमिका रही। इन दोनों देशों में भारत वंशियों के साथ जमकर मारपीट हुई और उनकी सम्पत्तियों को लूटा गया। उन्होंने यह भी बताया कि हालांकि दक्षिण अफ्रीका तथा जिम्बाव्वे अफ्रीकी देश है,पर इनके गोरे राजनयिकों और अधिकारियों के साथ घर किराया देने में भेदभाव नहीं किया जाता। बहुत से घरों के स्वामी तो इन्हें भी यूरोप का भी नागरिक मानते हैं। इस बीच, राजधानी के किराया बाजार में सर्वाधिक मांग अमेरिका, यूरोप के देशों से संबंध रखने वालों की ही है।

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