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पनबिजली कंपनियों को मिल सकती है कर छूट

देश की हर पंचवर्षीय योजना में बिजली उत्पादन का लक्ष्य एक बड़े मार्जिन से पीछे रह जाना अब न तो किसी के लिए ताज्जुब की बात रह गई है और न संभवत: ज्यादा दुख की। सरकार भी शायद इसे नियति मान ही चुकी है। त्रासदी यह है कि हम अपनी क्षमता का भी पूरा इस्तेमाल कर पाने में नाकाम रहे हैं। हाइड्रो बिजली क्षेत्र भी सरकार की एक ऐसी ही दुखती रग है जिसमें छुपी हुई संभावना और क्षमता का लगभग एक तिहाई भी उपयोग में नहीं आ पा रहा। देश में तीन चौथाई से भी अधिक हाइड्रो परियोजनाएं अभी भी सार्वजनिक क्षेत्र के हाथों में है। केन्द्रीय बिजली प्राधिकरण (सीईए) के सूत्रों के अनुसार, सितंबर 2007 तक देश के निजी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा शुरू की गई (कमीशंड) स्थापित हाइड्रो बिजली क्षमता केवल 4 प्रतिशत तक पहुंच पाई हैं। देश के पहाड़ी क्षेत्रों में संभावनाएं तो अकूत हैं लेकिन पनबिजली संयंत्र की स्थापना में कई प्रकार की दिक्कतें पेश आती हैं और जबतक इसके लिए प्रोत्साहन नहीं दिए जाते, निजी कंपनियां इसके लिए सामने नहीं आएंगी। सरकार ने देरसबेर ही संभवत: इसका अहसास किया है और यही वजह है कि उसने हाइड्रो बिजली परियोजनाओं के निर्माण में निजी क्षेत्र की भागीदारी को आकर्षित करने के लिए उन्हें 2011 तक कर छूट की सुविधा प्राप्त हो सकती है। बिजली क्षेत्र से जुड़े सूत्रों ने बताया कि सरकार 2011 तक हाइड्रो बिजली परियोजनाओं से जुड़ी निजी क्षेत्र की कंपनियों को टैरिफ आधारित बोली से अलग रखने पर विचार कर रही है। बिजली मंत्रालय द्वारा रखे गए प्रस्ताव के अनुसार, निजी क्षेत्र की कंपनियों के रेट कोट करने की जरूरत नहीं होगी।वर्तमान में सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को यह छूट मिली हुई है। जानकारों का मानना है कि इससे देश की लगातार बढ़ती जरूरतों की पूर्ति में मदद मिलेगी। जब परियोजना पूरी हो जाएगी, उस वक्त बाजार दर के हिसाब से रेट का फैसला किया जाएगा। हालांकि इसके साथ यह प्रावधान भी जोड़ा जा रहा है कि जो डेवेलपर अनुशंसित समय सीमा के भीतर परियोजना का विकास नहीं कर पाएंगे, उन्हें आर्थिक रूप से दंडित किया जा सकता है।

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