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अस्पताल के बिस्तर पर ‘पद्मभूषण’

प्रसिद्ध साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल के ‘पद्मभूषण’ के लिए चयन की खबर नगर में जितनी तेजी से फैली, उसके साथ एक चिन्ता भी पिछलग्गू हो गई। करीबी शुभचिन्तकों, साहित्यिक मित्रों को भी यह जानकारी ‘पद्मभूषण’ के बहाने ही मिली कि श्रीलाल जी पिछले दो दिनों से चिकित्सालय में भर्ती है। खाने की नली के अवरूद्ध होने के कारण उन्हें अचानक पड़ोस के निजी चिकित्सालय में दाखिला लेना पड़ा। खाने की नली के अवरूद्ध होने के साथ ही बुखार, रक्तचाप जैसी कई और शिकायतें भी उभर आईं हैं। लेकिन इन्दिरानगर के उजाला नर्सिग होम के 105 संख्या वाले कक्ष में उन्होंने भरसक लोगों की शुभकामनाओं का आभार जताने का प्रयास किया। कभी उनके बेटे आशुतोष यह कहते हुए मोबाइल थमा देते कि बीबीसी वाले चाहते हैं कि बस एक पंक्ित कुछ कह दीजिए। कभी रमेश दीक्षित जैसे शुभचिन्तकों का फोन वे खुद टाल नहीं पाते। विस्मृति और कमजोरी से पिछले कुछ साल से जूझ रहे लोकप्रियता के नए मानक रचने वाले ‘राग दरबारी’ के लेखक के लिए सम्मान की यह घोषणा अस्पताल में किसी फूलों के गुलदस्ते की तरह थी जिसने उनके मन को थोड़ा पुलकित तो किया। लेकिन इस संवाददाता से उन्होंने धीरे से कहा कि पद्मभूषण के लिए 10 में ही प्रदेश सरकार ने मेरे नाम का प्रस्ताव किया था। फिर कहते हैं कि मुझे यह समझ में नहीं आता कि पिछले कई वर्षो से किसी साहित्यकार को पद्मविभूषण से सम्मानित क्यों नहीं किया गया? श्री शुक्ल कहते हैं कि वास्तव में ऐसे सम्मान ये बताने के लिए होते हैं कि उन्हें लक्षित किया गया है और अब आगे के काम पर भी नजर होगी। फिर कहते हैं कि लेकिन मैं तो एक-डेढ साल से कुछ कर ही नहीं पा रहा हूँ। ‘राग दरबारी’ के अतिरिक्त ‘सूनी घाटी का सूरज’, ‘अज्ञातवास’, ‘सीमाएँ टूटती हैं’, ‘मकान’, ‘आदमी का जहर’, ‘पहला पड़ाव’, ‘विश्रामपुर का सन्त’, ‘अंगद का पांव’, ‘यहां से वहाँ’, ‘उमरावनगर में कुछ दिन’ उनके प्रमुख उपन्यास और व्यंग्य हैं। ‘राग दरबारी’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है।ं

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