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सबको मिले तरक्की में भागीदारी का हक

अगर तुम अपने घर की खिड़की खोल कर रखोगे तो तुम्हें अजान की आवाा सुनाई देगी, लेकिन साथ ही साफ हवा भी अगर अंदर आती है तो यह बोनस होगा। यह उस शिक्षक की पढ़ाई है, जिसे पढ़कर 26 साल का अकबर तालिबान के लिए बंदूक उठाने से नहीं घबराता। अकबर ने कोई धार्मिक पढ़ाई नहीं की। जब से होश संभाला तभी से अपने अशिक्षित मां-बाप को खेतों में काम करते देखा। अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले ने अकबर को अंदर से हिला दिया। तालिबान की रक्षा में वह बदूंक लेकर मुल्तान से निकल पड़ा। वहीं हाशिम की स्थिति थोड़ी अलग है। अफगानिस्तान पर हमले के दौरान एक दिन मस्जिद में जब हाशिम देर तक रुका रहा, तब उसने जाना मुस्लिम किस तरह संकट में हैं और इस तरह उसने निर्णय लिया कि गरीबी में हर दिन मरने से बेहतर जेहाद में शामिल होना है। बीमार बेटी के लिए दवाई से ज्यादा जरूरी उसे हथियार लगता है और राइफल खरीद कर वह अपने जैसे गरीब तालिबानियों और धर्म की रक्षा के लिए घर से निकल पड़ता है। इसी तरह अलग-अलग परिस्थितियों में जलाल, उस्मान, जमील, इमरान, राशिद और असलम सरीखे 517 युवा जेहाद के लिए किस तरह घरों से निकलते हैं इसका जिक्र पाकिस्तान के नेशनल बुक फाउंडेशन की प्रोबिंग द जेहादी माइंडसेट नामक किताब में किया गया है। सोहेल अब्बास की लिखी इस किताब में न सिर्फ आतकंवादियों के दिमाग़ को टटोलने की कोशिश की गई है बल्कि उन सवालों के जवाब खोजने की कोशिश भी है जिसके जरिए सामाजिक-आर्थिक ताना-बाना कैसे-कौन बुनता है और राजनीति कैसे जेहाद में या आतकंवाद के रास्ते को उस खास क्षण में सही ठहरा देती है। लेकिन अनजाने में ही यह किताब तीसरी दुनिया में फैलते उस आर्थिक आतंकवाद की ओर भी इशारा कर जाती है, जहां हथियार से कहीं ज्यादा घातक तरीके से असमानता बहुसंख्य तबके को हिंसक बना रही है। इसके संकट कई स्तर पर हैं, पर इस आर्थिक आतंकवाद और जेहादी आतंकवाद के दायरे में अगर सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों को परखें तो सही मायने में भविष्य के खतरों को समझा जा सकता है। आतंकवाद को भारत दो दशकों से झेल रहा है। आतंकवादी हिंसा में सीमा पार के आतंकवादियों की बिसात तो होती है, लेकिन हिंसा करने वाले नब्बे फीसदी आतंकवादी भारत के ही नागरिक रहे हैं। जिन लोगों ने आतंकवादी हिंसा को अंजाम दिया है अगर उनकी आर्थिक स्थितियों को देखें तो निम्न मध्यम परिवेश से ऊपर कोई नहीं है। कह सकते हैं कि तालिबान के लिए निकले हाशिम या अकबर जैसी ही सोच इनमें भी रही होगी। पाकिस्तान के पेशावर और हरीपुर जेल में बंद आतंकवादियों से इंटरव्यू के दौरान पाकिस्तान की सत्ता को लेकर भी जो सवाल-जवाब हुए उसमें यह बात भी उभरी कि परवेा मुशर्रफ से मुस्लिम हितों की रक्षा को लेकर कोई भरोसा इन आतंकवादियों में नहीं था। जेहाद के लिए जान देने वाले इन आतंकवादियों का मानना है कि अगर तालिबान बच जाते तो पाकिस्तान भी सच्चा मुस्लिम देश हो सकता था। मुशर्रफ अमेरिका से हाथ मिला चुके हैं और एक खास तबके लिए पैसों की खातिर पाकिस्तान को बेच रहे हैं। यह निराशा ऐसे दौर में सबसे ज्यादा नजर आ रही थी जिस दौर में मुशर्रफ पाकिस्तान के लिए सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था की बात कर रहे थे। इस दौरान पाकिस्तान का सकल घरेलू उत्पाद 65 अरब डॉलर से बढ़कर 125 अरब हो गया है। जीडीपी 3.1 फीसदी से बढ॥कर 8.5 फीसदी पर पहुंच गई है। पाकिस्तान का कुल जमा विदेशी कर्ज 3अरब से घटकर 36 अरब डॉलर रह गया। प्रति व्यक्ित आय 460 डॉलर से बढ़कर 800 डॉलर हो गई। विदेशी मुद्रा कोष दयनीय 30 करोड़ डॉलर से बढ॥कर 12.5 अरब डॉलर हो गया। निर्यात 1े 7-8 अरब डॉलर से बढ़कर 17 अरब डॉलर हो गया। मुशर्रफ के मुताबिक आर्थिक सुधार का जो काम वह कर रहे हैं, पाकिस्तान के इतिहास में इस तरह की तरक्की पहले कभी नहीं हुई। मगर इसी दौर में वह 517 युवा पाकिस्तानी अलग-अलग परिवेश से तालिबान के लिए लड़ाई लड़ने निकलते हैं, जो अपनी गरीबी-बेगारी दूर करने के लिए मुशर्रफ को नाकाबिल मानते हैं। और जेहाद में इस भरोसे शामिल होते हैं कि उनकी लड़ाई से सच्चे मुसलमान सत्ता में आ पाएंगे तो पाकिस्तान की स्थिति भी सुधर जाएगी। अगर इसी दौर में भारत के आर्थिक सुधार का चेहरा देखें तो एनडीए सरकार से यूपीए सरकार के आने की बड़ी वजह वही इंडिया शाइनिंग रही, जिस पर कभी वाजपेयी सरकार को गुमान था। आंकड़ों के लिहाज से सकल घरेलू उत्पाद दुगुने के करीब पहुंचा। विदेशी कर्ज 40 फीसदी घटा। निर्यात 0 फीसदी से ज्यादा बढ़ा। विदेशी मुद्रा भंडार में अच्छी-खासी वृद्धि हुई। सेंसेक्स ने कमाल की छलांग लगाई। भारत में पाकिस्तान की तर्ज पर सैनिक सत्ता नहीं, बल्कि संसदीय प्रक्रिया है जो हर तबके को एहसास कराती है कि भागीदारी उसकी भी हो रही है। इसलिए एक सोच यह बनती है कि सरकार के विरोध के लिए यहां सीधे बंदूक नहीं उठाई जाएगी बल्कि विरोध को वैचारिकोमीन पर उपजाया जाएगा। और संख्या बल के आधार पर लड़ाई जीतने की कोशिश होगी। लेकिन जब देश आर्थिक तरक्की की दर को दस फीसदी और उसके पार ले जाने का सपने देख रहा है, नक्सलवाद तेजी से अपना आधार फैला रहा है। नक्सलवाद के खिलाफ दिल्ली में मुख्यमंत्रियों की जितनी बैठकें पिछले दो साल में हुई हैं उतनी तो शायद राष्ट्रीय विकास परिषद की भी नहीं हुई। एक तर्क तो यह हो सकता है कि आर्थिक तरक्की आधार काफी संकुचित है। विकास का लाभ सब लोगों तक नहीं पंहुच रहा है। और जिन तक यह लाभ नहीं पंहुचता वे हथियार का रास्ता चुन सकते हैं - फिर चाहे लोकतंत्र हो या तानाशाही। भारत हो या पाकिस्तान जरूरत दरअसल तरक्की की अवधारणा को आंकड़ों से आगे ले जाने की है। सबको तरक्की का लाभ मिले यह तो जरूरी है ही साथ ही तरक्की की दौड़ में भाग लेने का अधिकार भी सबको मिले, यह भी उतना ही जरूरी है। राजनीति को वोट के अधिकार से आगे ले जाने का समय आ गया है। लेखक टीवी पत्रकार हैं

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