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परिस्थितियों को अनुकूल बनाएं

दुख का सबसे बड़ा कारण है, परिस्थितियों के अनुसार अपने को न ढाल पाना। नई परिस्थितियों में एकाएक आ जाने के कारण, लोग मन से व्यग्र हो उठते हैं, दुश्चिन्ताओं से घिर जाते हैं। हमार समाज में दो प्रकार के व्यक्ति हैं, एक तो वे जो कदम-कदम पर सुख सुविधाओं के आदी हैं, दूसरों पर ही अवलम्बित रहते हैं। नई परिस्थितियां उन्हें दुखी कर जाती हैं। दूसर वर्ग में वे लोग आते हैं जो अपने काम बिना किसी पर निर्भर हुए बखूबी कर लेते हैं। वे समय पड़ने पर परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल भी लेते हैं। हमार मन में एक गुप्त शक्ति है, जिसे मनासिक स्वावलम्बन कह सकते हैं। यदि मनुष्य अपने मन में ‘करने’ की ठान ले तो निश्चित सामथ्र्य शक्ति विषमता पर विजय प्राप्त कर लेगी। क्या आपने कुएं की ईंट में या दीवारों की दरार में उगे पीपल के पेड़ को देखा है? इसके पास पर्याप्त मिट्टी नहीं, जड़ों के फैलने की गुंजाइश नहीं, प्रकाश, वायु नहीं, फिर भी बढ़ता जाता है, मजबूत होता जाता है। जड़ें आड़ी-तिरछी हो कर, विषम परिस्थितियों में जीवन के लिए भोजन उपकरण एकत्र कर लेती हैं। पहाड़ों, चट्टानों पर वृक्ष उगते हैं, बड़े होते जाते हैं। इस प्रकार पहाड़ों पर वन के वन हो जाते हैं। आश्चर्य होता है, कठोर चट्टान से वे कैसे मिट्टी और जल एकत्र कर लेते हैं? कोलम्बस जब अमेरिका की खोज में निकला तो उसके पास एक मामूली-सा जहाज ही था। मित्र नाविकों ने उसे आने वाले कष्टों के बार में बता कर खूब डराया। उन्होंने कहा इतनी बड़ी यात्रा के लिए तुम्हार पास न पर्याप्त धन है, मौसम परिवर्तन के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है, तुम कैसे इतनी बड़ी यात्रा कर पाओगे? पर कोलम्बस ने किसी की नहीं सुनी, वह मन में ठान चुका था। यात्रा पर निकल पड़ा और सफल रहा, उसकी यात्रा पूर्ण हुई, उसने अच्छी-बुरी परिस्थितियों का सामना किया। मन के इसी ‘दृढ़ निश्चय’ ने उसे इतिहास में अमर बना दिया। सम्राट शाहाहां को उनके ही पुत्र औरंगजेब ने बंदी बना लिया। लोगों ने सोचा बादशाह कहां झेल पाएंगे, जेल का कठोर जीवन? चंद दिनों में ही अल्लाह को प्यार हो जाएंगे। पर बादशाह ने परिस्थितियों के अनुसार ही अपने ढाल लिया। जेल में बच्चों को पढ़ाने का काम मांगा। उन्हें हुकूमत की आदत थी, बच्चों को पढ़ा कर अपनी हुकूमत की प्रवृत्ति को संतुष्ट करते रहे। यदि जेल के विषम जीवन के बार सोच-सोचकर घुटते रहते तो क्या होता? मनुष्य के स्वभाव और शरीर की बनावट कुछ इस प्रकार की है कि समय और परिस्थिति के अनुसार वह अपने को ढाल सकता है। गीता में कृष्ण ने इस विषय का संकेत दिया है। समत्वयोग का मतलब ही यह है कि मनुष्य सभी परिस्थितियों, अड़चनों-कष्टों, हानि-लाभ, मान अपमान से प्रभावित न हो। संवेदना का केंद्र बाह्य पदार्थो में न रख, आत्मा में, ईश्वर में बनाएं। सोडहमं अंहब्रह्म, एकोह्म बहुस्याय्। मैं पूर्ण ब्रह्म हूं पूर्ण समर्थ हूं। अपनी आत्मशक्ति से जीवन मार्ग पर निरंतर बढ़ रहा हूं।ं

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