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अदालत की मुहर

आप चाहें तो उच्च शिक्षा संस्थानों में पिछड़े वर्गो के आरक्षण को जायज ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राजनैतिक नार से देख सकते हैं। भले ही यह मजबूरी में किया गया फैसला हो या अजरुन सिंह की किसी कूटनीति का नतीजा, पर यह संप्रग सरकार का सबसे बड़ा राजनैतिक फैसला था। इसेोमीन पर उतारने के लिए उसे भारी संघर्ष भी करना पड़ा था। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपनी मुहर लगा दी है तो क्या इसे संप्रग सरकार की जीत माना जा सकता है? पर मामले को अदालत में ले जाने वाले मानते हैं कि यह उनकी जीत है क्योंकि अदालत ने पिछड़ों की मलाईदार परत को इस आरक्षण के लाभ से वंचित कर दिया है। तर्क यह भी है कि यह जानते हुए भी कि यह मसला अदालत में बहुत ज्यादा ठहर नहीं पाएगा, सरकार के कई घटक मलाईदार परत के मसले कोोिद की हद तक ले गए थे। अभी हम भरोसे से यह नहीं कह सकते कि इस हार जीत से अगले आम चुनाव में किसको कितना फायदा मिलेगा, लेकिन आरक्षण का मसला अब उस जगह पहुंच गया है जहां इसे राजनीति से अलग कर के ही देखना होगा। इस फैसले के साथ ही मंडल आयेाग ने पिछड़ों को आरक्षण की जो बात की थी, वह अपनी अंतिम परणति तक पहुंच गई है। सरकार ने यह वादा किया था कि इस आरक्षण की वजह से गैर आरक्षित वर्गो की सीटों की संख्या कम नहीं होने दी जाएगी। इसलिए हमें यह उम्मीद करनी चाहिए कि आरक्षण के लागू होते ही यह व्यवस्था भी हो जाएगी। और यह भी कि जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लगभग सभी लोगों ने स्वीकार लिया है, उस सामाजिक संतुलन को भी लोग स्वीकार लेंगे, जो इस आरक्षण की वजह से हमार जीवन का हिस्सा बन जाएगा। शायद इसी से देश व समाज की तरक्की के नए रास्ते खुलें। यह आरक्षण की राजनीति को नमस्कार कहने का सही वक्त है, पर शायद यह काम इतनी आसानी से नहीं होगा। निजी क्षेत्र में आरक्षण जसे मसले पहले ही उठने लग गए हैं। आरक्षण की मांग के पीछे दरअसल एक सोच यह भी काम करती है कि हम सबको उनकी योग्यता के हिसाब से रोगार और उच्च शिक्षा नहीं दे सकते, इसलिए आरक्षण के जरिये उपलब्ध अवसरों को उचित अनुपात में बांट देना चाहिए। इसमें सभी को शिक्षा और रोजगार दे पाने की नाकामी का एहसास भी है। दरअसल, यह वक्त ईमानदारी से स्वीकार करने का है कि हम सभी रोगार और उच्च शिक्षा नहीं दे सकते। अपनी विकास दर को दहाई अंक तक ले जाने को आतुर देश और समाज को इतना आत्मविश्वास तो पैदा करना ही होगा। नए दौर के लिए स्वस्थ राजनीति इसी आत्मविश्वास से पैदा होगी।ं

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