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सवाल बिहार को बदलने का है!

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी मंत्रिपरिषद में 1नए सदस्यों को शामिल कर लिया है। साथ ही, उन्होंने दस को कार्यमुक्त भी कर दिया। इससे पहले उन्होंने राज्य में पुलिस व प्रशासन के शीर्ष स्तर पर भारी फेरबदल किए। उन्होंने अपने दल के प्रमुख कार्यकर्ताओं की बैठक में यह साफ कह दिया कि यदि उन्हें पुरानी राजनीतिक संस्कृति में ही रहना है तो वे उन्हें छोड़ दें। यानी, वे यह कह रहे थे कि वे जंगलराज की संस्कृति वाला मुख्यमंत्री कतई नहीं बनना चाहते।ड्ढr पर इतने व्यापक फेरबदल की जरूरत क्यों पड़ी? अपन कार्यकाल की मध्यावधि समीक्षा के बाद नीतीश कुमार को यह महसूस हुआ है कि उनकी सरकार व पार्टी भी पिछली राजनीतिक व प्रशासनिक संस्कृति से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पा रही। इसलिए यदि तत्काल कोई कड़ा कदम नहीं उठाया गया तो ‘सुशासन व न्याय के साथ विकास’ का उनका लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा। जाहिर है कि बिहार के प्रशासन व राजनीति में भ्रष्टाचार व काहिली की दसियों साल से जमी काई को साफ करने में इतना अधिक समय लगेगा, इसका पूर्वानुमान शायद नीतीश कुमार को भी नहीं रहा होगा। सरकार ने नवंबर, 2005 में सत्ता संभाली थी। 28 महीन रातदिन खटकर मुख्यमंत्री चीजों को एक हद तक पटरी पर लाए भी हैं, पर गति उतनी नहीं है, जितनी मुख्यमंत्री चाहते हैं। उसी गति को हासिल करन की कोशिश में भारी फेरबदल किए गए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा है कि वे राज्यभर में घूम घूमकर विकास कार्यों का औचक निरीक्षण करेंगे और जहां भी कोई गड़बड़ी पाई जाएगी, उस पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। लगता है कि उन्होंने राज्य की मूल समस्या को पहचाना है, पर कठोर कदम उठाया जाना अभी बाकी है। बिहार की मुख्य समस्या राज्य की सरकारी विकास योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार की है। इस कारण भी राज्य का विकास नहीं हो सका। पचास व साठ के दशकों की विफल कोसी व गंडक नदी योजनाएं इनके सबूत हैं। बाद के वर्षों में ता करीब-करीब हर विकास व कल्याण योजना में माफिया तत्व घुन की तरह लग गए और उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिलने लगा। हाल के वर्षों में खूंखार अपराधियों ने भी राजनीतिक मदद से विकास व निर्माण योजनाओं पर अपना पंजा गड़ा दिया। नीतीश सरकार ने सत्ता में आन के बाद इन बाधाओं को दूर करन की पहल की। पर यह पहल व कोशिश मुख्यमंत्री स्तर से ही अधिक रही। उनके मंत्रिमंडल के अधिकतर सदस्य पिछले बीस वर्षों में राज्य में जारी अन्य सरकारों की तर्ज पर ही कमोबेश काम करते रहे। शायद इसलिए गत 13 अप्रैल को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी मंत्रिपरिषद का महापुनर्गठन किया, उसके साथ ही उन्होंने अपने सारे मंत्रियों के विभाग भी एक साथ बदल दिए। ऐसा संभवत: पहली बार हुआ है। बिहार की राजनीतिक कार्यपालिका पर यह बहुत बड़ी टिप्पणी है। यानी मुख्यमंत्री इस नतीजे पर पहुंचे थे कि उनके अधिकतर मंत्री अपने पिछले विभाग के काम के साथ न्याय नहीं कर रहे थे। निर्माण स्थलों के औचक निरीक्षण की मुख्यमंत्री की घोषणा भी अधिकतर संबंधित विभागों के मंत्रियों की अक्षमता व अकुशलता ही साबित करती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गत 3 अप्रैल को पटना के लोहिया नगर के नाला निर्माण कार्य का जब औचक निरीक्षण किया तो उन्हें लग गया कि खुद उनको ही यह काम करना पड़ेगा। मंत्रियों पर यह काम नहीं छोड़ा जा सकता। मंत्रिमंडल में भारी फेरबदल कई स्रोतों से मिल रही कई मंत्रियों की ‘कार्य-कुशलता’ के बारे में रिपोर्ट के आधार पर ही किए गए। सीएजी ताजा रपट भी राज्य सरकार को शर्मिदा करने वाली ही है। फेरबदल के साथ अब एक तरह से मंत्रियों को चेतावनी भी दी दे गई है। हालांकि सार्वजनिक तौर पर मुख्यमंत्री न कहा है कि मंत्रिपरिषद में फेरबदल का आधार क्षमता-अक्षमता नहीं है। बल्कि हटाए गए मंत्रियों को दूसरी जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। पर यह ता कहने भर की बातें हैं। स्थिति बिगड़ी हुई थी। अब भी सुधरेगी या नहीं, फिलहाल नहीं कहा जा सकता, क्योंकि पुरानी आदतें जल्दी नहीं जातीं। हालांकि यह बात भी है कि जितने मंत्री हटाए गए हैं, वे सब अक्षम और जो रह गए वे सक्षम हैं, यह भी दाव के साथ नहीं कहा जा सकता। इस महाफेरबदल में वस्तुपरकता के साथ साथ कुछ हद तक व्यक्ितपरकता के तत्व ने भी भूमिका निभाई है। पर कुल मिलाकर संदेश यही है कि अब भी सुधर जाओ अन्यथा यह अंतिम फेरबदल नहीं है। अफसरों को भी यही संदेश मुख्यमंत्री ने दिया है। अब जरा नाला निरीक्षण की बात करें। मुख्यमंत्री ने पाया कि वहां सरकार की नाक के नीचे घटिया निर्माण हो रहा है। निर्माण के बीस दिन में ही वह नाला ध्वस्त हो गया था। जब पटना में यह हाल है, तो सुदूर देहाती क्षेत्रों में कैसा निर्माण हो रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। मुख्यमंत्री ने निर्माण स्थल पर ईंट, सीमेंट और मिट्टी को देखकर ही कह दिया कि निर्माण कार्य काफी घटिया हो रहा है। उन्होंने तत्काल कानूनी व प्रशासनिक कार्रवाई का आदेश दिया। निर्माण कार्य में लगा एक ऐसा पेटी ठेकेदार गिरफ्तार किया गया जिसने बड़े संबंधित ठेकेदार से जबरन वह काम ले लिया था। मूल ठेकेदार ता कें्रद सरकार का एक निगम है। ऐसी विफलता अन्य कई विभागों मे भी देखी जाती रही है। सारे मंत्रियों के विभाग बदल दिए जान का यही कारण रहा होगा। पर, इसके साथ ही सरकार के काम करन के पुराने र्ढे के जारी रहन के भी अनेक सबूत मिले हैं। ताजा फेरबदल को लेकर कुछ विरोधी स्वर जरूर उभरे हैं, पर सरकार गिरन का कोई खतरा दिखाई नहीं पड़ रहा है। विरोधी स्वर भाजपा में ही अधिक है। राज्य में जितने बड़े पैमाने पर एक साथ विकास व निर्माण के कार्य चल रहे हैं, उतन कार्य बिहार में पहल कभी नहीं हुए थे। मुख्यमंत्री से यह कहा गया कि यदि एक तरफ निर्माण कार्य हों और निर्माण घटिया होन के कारण दूसरी तरफ से निर्मित ढांचा ढहता भी चला जाए तो अगले विधानसभा चुनाव से पहले तो सारे निर्माण कार्य ध्वस्त हो चुके होंगे। फिर जनता आपको अगली बार किस आधार पर जिताएगी? शायद मुख्यमंत्री ने इस चेतावनी को गंभीरता से लिया है। क्या उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों ने भी इस चेतावनी को समझा है ?ड्ढr लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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