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झरिया : आग बढ़ती गयी योजनाएं बनती रहीं

झरिया में 0 साल पहले पहली बड़ी आग देखी गयी थी। तब निजी उद्यमी कोयला का खनन कर रहे थे। बेहिसाब खनन से 70 जगहों पर आग फैल गयी। तब से भूमिगत आग बढ़ती गयी और निदान के लिए समितियों के गठन होने का सिलसिला चलता रहा। वे कार्य योजना सुझाती गयीं, लेकिन अब तक थोड़ा सा भी नियंत्रण नहीं हुआ है। 2002 में तत्कालीन सीएम बाबूलाल मरांडी ने शहर को स्थानांतरित करने का सुझाव दिया था। तीन लाख लोगों को स्थानांतरित करना पड़ता और एक लाख मकान की जरूरत पड़ती। स्थानीय विरोध के बाद मरांडी ने योजना वापस ले ली। सीएमआरआइ के पूर्व निदेशक डीडी मिश्रा का कहना है कि आग बुझायी नहीं जा सकती। लेकिन तत्कालीन बिहार विधान परिषद के सदस्य गौतम सागर राणा के नेतृत्ववाली समिति ने सुझाव दिया था कि पूरी आबादी के स्थानांतरण में 18 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। वहीं मिश्रा का कहना है कि इस तुलना में आग बुझाने पर मात्र आठ हजार करोड़ रुपये ही खर्च होंगे। डीडी मिश्रा के मुताबिक उपलब्ध तकनीकी और राजनीतिक इच्छाशक्ित के सही संतुलन से आग मुनासिब लागत में बुझायी जा सकती है। अब गोविंदपुर में हुडको द्वारा नया नगर तैयार किया जा रहा है, जहां झरिया के लोगों को स्थानांतरित किया जायेगा। योजनाओं का सफर 1में केंद्र ने कहा कि आग बुझायी जाये, ताकि कोयला निकल सके। तत्कालीन कोयला राज्यमंत्री पीएस संगमा ने कहा था 750 करोड़ का कोयला आयात होता है, इसलिए झरिया की आग पर काबू पाकर खनन काम शुरू किया जाना चाहिए। 2004 में मंत्रालय की बोली बदल गयी। संसद में कहा गया कि झरिया शहर के नीचे जमीन में और आग नहीं है। इसलिए शहर को ट्रांसफर करने की योजना नहीं है। 1में सीएमपीडीआइ ने 115 करोड़ रुपये की योजना बनायी थी। 1में बीसीसीएल ने एबेडंन (परित्यक्त) कोयला खदानों के उद्धार के लिए चारी समिति को बताया था कि मैट्रिक टन कोयला बचाने के लिए 6रोड़ रुपये खर्च आया है। 1में आग की पड़ताल और उस पर काबू के लिए विश्व बैंक ने परियोजना तैयार की। 1में सीएमपीडीआइ ने बीसीसीएल के पट्टेवाले इलाके में आग से निपटने के लिए मास्टर प्लॉन बनाया। उसमें हर वर्ष संशोधन होता गया। 2006 इस परियोजना पर संशोधित खर्च 8637 करोड़ रुपये बैठा। 2007 में धनबाद के निकट गोविंदपुर में नयी कॉलोनी बसाने का काम शुरू हुआ। हुडको ने नौ सौ मकान बना दिये हैं।

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