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माया का परचम

उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में माया का हाथी सब पर भारी सिद्ध हुआ। राज्य की दो लोकसभा और तीन विधानसभा सीटों पर हाथ, साइकिल और कमल के दलों की दाल नहीं गली, बीएसपी का सर्वजन समाज का नारा छाया रहा। मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने तो जसे-तैसे इज्जत बचा ली, किन्तु कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों की पांच में से चार चुनावों में जमानत जब्त हो जाना, उन्हें जमीनी हकीकत से रू-ब-रू कराने को काफी है। लोकसभा चुनाव बस एक बरस बाद हैं, ऐसे में देश के सबसे बड़े सूबे से दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए गला सुखा देने वाले नतीजे आना शुभ संकेत नहीं हैं। टक्कर देकर हार जाने और चारो खाने चित हो जाने में भारी ोद हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पहले से ही लकवाग्रस्त है, इसलिए ताजा पराजय से उसे ज्यादा अंतर नहीं पड़ेगा। हां, भाजपा के लिए मुंह छिपाना और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के लिए सफाई देना्र, जरा मुश्किल है। मुरादनगर, करनैलगंज और बिलग्राम विधानसभा चुनावों में पार्टी को क्रमश: 1.35, 3.5 तथा 5.03 प्रतिशत मत पड़े। इस हिसाब से तो आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाने का खतरा है। आजमगढ़ में दूसरा स्थान पाने का संतोष तथा मध्य प्रदेश के बैतूल संसदीय चुनाव में कांग्रेस को धूल चटाने का हर्ष, भाजपा के लिए नाकाफी है। मुख्यमंत्री मायावती का दावा है कि उपचुनावों में कांग्रेस, भाजपा, सपा और रालोद ने उनके खिलाफ मिलकर लामबंदी की थी। बहुान समाज पार्टी ने अकेलेदम चुनाव लड़ा और जीता, इसलिए उनकी उपलब्धि कहीं बड़ी है।ड्ढr अब यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि जहां मायावती का दलित-ब्राह्मण गठाोड़ एकाुट हैं, वहीं समाजवादी पार्टी का मुस्लिम, ठाकुर व यादव वोटबैंक दरक रहा है। आजमगढ़ में बीएसपी के प्रत्याशी अकबर अहमद डम्पी ने मुसलमान वोट जमकर बटोर। भाजपा की परशानी यह है कि उसके पास न तो कोई प्रतिबद्ध जातिगत वोटबैँक है और न ही कोई चमत्कारी नेता। ऐसे में चुनावी वैतरणी पार करना निरंतर कठिन होता जा रहा है। कांग्रेस पूरी तरह नेहरू-गांधी परिवार पर आश्रित है। उसके कार्यकर्ताओं ने धूप में निकलना बंद कर दिया है, फिर लखनऊ या दिल्ली के सिंहासन तक का सफर कैसे तय किया जा सकता है? वैसे तो राजनीति में एक बरस में बहुत कुछ बदल जाता है, किंतु ताजा उपचुनाव परिणाम मायावती का डंका पीट रहे हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री का अगला पड़ाव लक्ष्य दिल्ली है। यदि उन्होंने अपने गृह प्रदेश की अस्सी लोकसभा सीटों में बहुमत अर्जित कर लिया, तब उनकी राामंदी के बिना दिल्ली में राज करना किसी भी दल या गठबंधन के लिए कठिन हो जाएगा।

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  • Web Title: माया का परचम