class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

शेयर बाजार पर महंगाई की मार

इस महीने मौसम की तरह ही शेयर बाजार ने भी तमाम करवटे बदली हैं। मुंबई शेयर बाजार और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज दोनों के शेयर सूचकांक गोता लगाते और उछाल खाते दिखाई पड़े। इसका कारण वह मुद्रास्फीति भी थी, जो एक तरफ अर्थव्यवस्था को परशान कर रही है, तो दूसरी तरफ कई कंपनियों के मुनाफे भी बढ़ा रही है। साथ ही वह दौर भी गुजर गया है, जब बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी आ रही थी। आजकल विदेशी निवेशक खरीद कम रहे हैं, बेच ज्यादा रहे हैं। बाजार में उधार के संकट का सबसे ज्यादा असर उन डेरीवेटिव के कारोबार पर पड़ा है, जिनमें सबसेज्यादा जोखिम रहता है। वाश्िंग्टन में ग्रुप ऑफ सेवन की बैठक तक में यह चर्चा का विषय रहा है। और जब यह खबर आई कि डेरीवेटिव कारोबार की वजह से आईसीआईसीआई जसा बैंक भी परशानी में है तो उसके शेयर को लुढ़कना ही था। 11 अप्रैल को मुंबई शेयर बाजार का बैंकिंग उद्योग का सूचकांक 0.64 प्रतिशत तक टूट गया।ड्ढr हालांकि भारत के विकास की कहानी अभी तक तो बहुराष्ट्रीय बैंकों के उधार संकट के असर से अछूती रही है। पर अब लगातार बढ़ती मुद्रास्फीति ने परशानी खड़ी कर दी है। स्टील की कीमतों की तेजी ने मशीन उत्पादकों के मुनाफे पर असर डाला है। इमारती उद्योग पर तो दोहरी मार पड़ी है, उसे स्टील की कीमतों के साथ ही सीमेंट की तेजी से भी जूझना पड़ रहा है। वैसे स्टील की तेजी तो दुनिया भर में ही है। और अगर पिछले एक साल में स्टील की कीमत में साठ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है तो कोयले और अयस्क जसे उसके कच्चे माल की कीमतें तो इससे कहीं ज्यादा तेजी से उठी हैं। स्टील की कीमत में कोयले और अयस्क की भूमिका 70 फीसदी होती है। पिछले एक साल में लोहे के अयस्क का भाव दुगना हो गया है। लेकिन कोयले के भाव तो इस बीच तीन गुना हो गए हैं। 11 अप्रैल की सुबह जब सरकार ने यह बताया कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति की दर बढ़कर 7.41 फीसदी पर पंहुच चुकी है तो मुंबई शेयर बाजार के चढ़ते हुए सूचकांक ने लुढ़कना शुरू कर दिया। इस घोषणा से पहले जो सूचकांक 180 अंक तक उछल चुका था वह शाम होते-होते एक चौथाई फीसदी से ज्यादा नीचे टपक गया।ड्ढr ब हर सुबह की खबरों में पता पड़ने लगा कि केंद्र सरकार महंगाई से लड़ने के लिए एक के बाद एक रणनीति तैयार कर रही है। वह सीमा और उत्पाद शुल्क कम कर रही है, ताकि खाद्य तेल और इस्पात जसी जरूरी चीजों की कीमतों पर काबू पाया जा सके। लेकिन सरकार सिर्फ ऐसे ही कदमों के भरोसे नहीं रही, उसने स्टील और सीमेंट की कीमतों पर काबू पाने के लिए और कोशिशें शुरू कीं तो इन उद्योगों के शेयरों को गोता लगाना ही था। सरकार ने इसक लिए सीमेंट और प्राइमरी स्टील के निर्यात पर पांबदी लगा दी। नतीजा यह हुआ कि टाटा स्टील का शेयर जो कभी 0 रुपए में पहुंच गया था, वह लुढ़ककर 67पए पर जा पंहुचा। यही सेल का हुआ, उसका शेयर पिछले एक साल के शिखर 2पए से टपककर 160 रुपए पर आ गया। बाजार में जिंदल स्टील के शेयर की हालत खासी मजबूत रहती है। इसका शेयर गिरता हुआ 1883 रुपए पर पहुंच गया। यह शेयर अभी कु छ ही समय पहले 3365 रुपए की बुलंदी पर था। स्टील उत्पादक घर बनाने में इस्तेमाल होने वाले स्टील की कीमत घटाने पर तो राजी हो गए, लेकिन उन्होंने हॉट रोल्ड स्टील पर पांच हाार रुपए प्रति टन का भारी रॉ मैटीरियल सरचार्ज थोप दिया। नतीजा यह हुआ है कि टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं और ऑटोमोबाइल उद्योग में इस्तेमाल होने वाले स्टील की कीमत जो अक्तूबर में 34,400 रुपए प्रति टन थी वह अब बढ़कर 40,000 रुपए प्रति टन तक जा पहुंची है। जेएसडब्लू स्टील जसे स्टील उत्पादकों का कहना है कि जिस तरह से पिछले कुछ समय में कोयले और लौह अयस्क की कीमत तेजी से बढ़ी है, उसके चलते वे असहाय हैं। और जसे यह भी कम था भारत कोकिंग कोल लिमिटेड ने वाश्ड कोयले की कीमत 1800 रुपए प्रति टन बढ़ाने का फैसला कर लिया। इस समय सेल को यह कोयला 6300 रुपए प्रति टन के हिसाब से मिल रहा है। अयस्क और स्टील ने थोक मूल्य सूचकांक को 5.6 फीसदी बढ़ा दिया है। लेकिन शेयर बाजार का रुख क्या जता रहा था? क्या वह महंगाई से लड़ने की इन कोशिशों की व्यर्थता पर प्रतिक्रिया दिखा रहा था? या फिर उसमें भी कोई रणनीति थी? लौह अयस्क और पेट्रोलियम उत्पादों के दामों में बढ़ती हुई मांग के कारण जो बढ़ोतरी हुई है, उसका सीधा दबाब भारतीय उद्योगों पर पड़ा है और इसीलिए सरकार को इस मामले में कड़े कदम उठाने पड़े हैं। हालांकि अयस्क के दामों पर आखिर में इसका ज्यादा असर नहीं पड़ना है। मांग इतनी ज्यादा है कि माइनिंग कंपनियों के शेयरों में 2005 के मुकाबले 70 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिन्दुस्तान पेट्रोलियम के शेयर भी बढ़े हैं। हालांकि पेट्रोलियम बाजार की इस भारी तेजी उनके शेयर उस बुलंदी के आस-पास भी नहीं फटक सके, जहां रिलायंस इंडस्ट्री के पहुंच गए थे। रिलायंस सरकार की मूल्य नियंत्रण नीति के तहत पेट्रोल, डीाल और कैरोसीन पर दी जाने वाली सबसिडी के दायर में नहीं आती। दोनों निजी पेट्रोलियम कंपनियां रिलायंस और एस्सार ऑयल अपने उत्पाद या तो बाजार मूल्य पर बेचती हैं या फिर उसका निर्यात कर देती हैं। जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोल कंपनियां ईंधन को सरकार द्वारा तय कीमतों पर बेचती हैं। जिसके बदले में उन्हें नकदी के बदले ऑयल बांड मिलते हैं। इसके चलते उनका मुनाफा हमेशा ही खतर में पड़ा रहता है। यह ठीक है कि स्टील उत्पादकों को राष्ट्र के हित में अपना लोभ छोड़ देना चाहिए और कीमतों पर काबू रखना चाहिए। लेकिन उन्हें यह मालूम है कि एक बार जब बाजार अपना रुख बदलेगा तो इससे वे खुद को ठगा सा ही महसूस करंगे। तब रायसीन हिल में फैसले लेने वाला कोई भी उनकी मदद के लिए नहीं आएगा। लेखिका आर्थिक विषयों की पत्रकार हैं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: शेयर बाजार पर महंगाई की मार