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संस्मरण : मौन साहित्य-साधकों के वे दिन

वि सम्मेलन में भाग लेने के लिए काशीनाथ उपाध्याय ‘भ्रमर’ (बेधड़क बनारसी), कवि ठाकुर प्रसाद सिंह (बंशी और मादल) व इलाहाबाद के कई युवा गीतकार पधार थे। सम्मेलन की एक विशेष बात यह भी कि उसमें प्रथम बार भोजपुरी राज्य बनाने की जोरदार मांग उठी और प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। यह सन् 1े आरम्भ की बात है, जब द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म हो चुका था और ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के कैदी जेल से बाहर थे। मैंने सतीशचन्द्र कॉलेज में इन्टर फाइनल में पुन: दाखिला लेकर फर्स्ट ईयर के एक मोहल्ला-साथी बृजकिशोर के साथ, नागरी प्रचार सभा की गतिविधियों में जोर-शोर से भाग लेना शुरू किया था। अध्यक्ष पंडित परशुराम चतुव्रेदी जी हम पर खूब प्रसन्न रहते और कभी-कभी मुदित, गद्गद भाव से हमें ‘अगिया बैताल’ के नाम से विभूषित कर देते। चतुव्रेदी जी, बलिकया जिला के जवही ग्राम के निवासी थे। चौक के पास किराए के मामूली घर में रह कर वकालत करते थे। बड़ा परिवार, मुवक्िकलों से घिर, फुरसत न मिलने पर, वह तीन बजे रात को उठकर साहित्य-लेखन करते और किरण फूटने के पहले छड़ी लेकर घूमने के लिए बाहर निकल जाते। कचहरी से आने के बाद शाम को वह टाउन हॉल स्थित चलता पुस्तकालय के भवन नित्य पहुंचते, जहां अन्य लेखक-कवि तथा हम दोनों युवा दोस्त पहले से ही मौजूद रहते। बाद में पता पड़ा कि उन्हीं दिनों वह अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘उत्तर भारत में संत साहित्य की परम्परा’ लिख रहे थे। जिस पर बाद में हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग का ‘मंगला प्रसाद’ पारितोषिक प्रदान किया गया। जानकारों ने बताया कि इस पुस्तक के लिए न मालूम कब से सामग्री जुटाते रहे थे और छुट्टियों में न जाने कितने मठ-मठिया, अखाड़े आदि की यात्राएं भी करते थे। चतुव्रेदी जी तब साठ और सत्तर के बीच में होंगे। लम्बा, पतला स्वस्थ शरीर, सीधी चाल, छोटा मुखमंडल, अधपकी मूंछ, जिससे होंठ ढक से जाते। जोर से, रूखाई से, योग्यता के अहंकार-भर आत्मविश्वास से वह कभी नहीं बोलते। टाउन हॉल या सभा-सम्मेलन में जब कोई बात कहते तो लगता कि कोई रात की सुखमयी तृप्त नींद से उठकर, किसी बच्चे या आत्मीय से तन्द्रिल धीमी आवाज में बातचीत कर रहा हो। वाणी में ऐसी मिठास, गोया कोई नींद से जगाकर छोटी-सी कटोरी दूध में मिश्री घोलकर पिला दे। नागरी प्रचारिणी सभा के दूसर प्रतिष्ठित साहित्यकार कवि रामसिंहासन सहाय ‘मधुर’ जी थे। उनका गहरा परिचय राष्ट्रकवि दिनकर जी से था और उनको उस शहर में सर्वाधिक महत्वपूर्ण इसलिए समझा जाता था कि दिनकर जी ने अपने किसी आलेख में उनकी कविताओं की सराहना की थी। अन्य सुपरिचित कवियों में कवि सुन्दर जी और कवि मंजुल जी थे। यह पता तो नहीं कि वे जुड़वां भाई थे, लेकिन दोनों ही काफी ठिगने समान कद के, दोनों ही प्राइमरी स्कूल के टीचर और दोनों ही खड़ी बोली में राष्ट्रीय भावनाओं से प्रभावित बढ़िया कविताएं लिखते थे। सम्मेलन में भोजपुरी राज्य की क्यों इतनी जोरदार मांग उठी, यह हमें पता नहीं था। शायद राहुल सांकृत्यायन के कारण, जो उस समय साम्यवादी पार्टी के सदस्य थे और सोवियत संघ में भाषावार राज्यों का निर्माण किया गया था। राहुल जी सम्मेलन में नहीं आए थे, उनका सन्देश आया था। लेकिन उस सम्मेलन में भोजपुरी राज्य के सर्वाधिक मुखर प्रवक्ता प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डॉ. उदयनारायण तिवारी जी ही थे। वह भी भाषा और साहित्य के मौन साधकों में थे। अत्यन्त सरल, मृदु और ज्ञानी। पहले दारागंज के राधारमण कॉलेज में शिक्षक थे, लेकिन भाषा संबंधी उनकी पुस्तक अत्यंत सराही गई और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उनकी नियुक्ित हो गई। भदन्त जी ने भी भोजपुरी राज्य के विचार का समर्थन किया और दूसर महानुभावों के भी जोरदार भाषण हुए। उन्हीं भाषणों से मालूम हुआ कि बिहार के आरा जिला (तब शाहाबाद) से कई भोजपुरी पत्रिकाएं भी निकलती हैं।ड्ढr सम्मेलन में एक उत्साही नौजवान ने खूब तेज आवाज में सस्वर एक भोजपुरी लोकगीत का पाठ किया था। कृषक समाज के उल्लास को प्रकट करता हुआ लम्बा गीत - मकईया हो, तोहके बनाइब मोहरमाला भात तोहार भकर-भकर, सातू शकरपाला सब कोई तोहके खाला, मकईया हो तोहके बनाइब मोहरमाला इन दोनों महापुरुषों की निकटता हम साथियों की उपलब्धि थी। पंडित परशुराम चतुव्रेदी जी ने कहा था, ‘ये हमार ‘अगिया-बैताल’ न होते तो कैसा सम्मेलन, कहां भोजपुरी राज्य।’ड्ढr लेखक प्रसिद्ध कहानीकार हैंड्ढr

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