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वही अजरुन, वही बाण

सम्पादकीय ‘निशाना चूका’ पढ़ कर एक किस्सा याद आ गया। एक राजा को ‘खुशामद’ बिल्कुल पसंद नहीं थी। दरबारी-अधिकारी परशान कि क्या करं कि इनाम-ओ-इकराम का कोई अवसर ही नहीं मिलता था। ढूंढ़ते-ढूंढ़ते एक दरवेश के पास पहुंचे, अपनी व्यथा सुनाई और समस्या के समाधान की दुहाई दी। दरवेश ने कहा कि बुद्धिहीनों तुम्हें खुशामद का तौर-तरीका नहीं आता, खुशामद वह जो दिल को छू जाए। मैं जाऊंगा राजा से मिलने, फिर देखना। दरवेश राजा के दरबार में पहुंचे तो राजा ने पूछा कि आने का कष्ट कैसे किया? वह बोला महाराज, भला दरवेश को क्या चाहिए। जहां रैन, वहीं बसेरा। मिल गया तो खा लिया, नहीं तो ऊपर वाले का नाम लिया। सुना था कि प्रभु की बनाई इस धरती पर एक मानव ऐसा है जिसे ‘खुशामद’ पसंद नहीं है। आज देख लिया, तमन्ना पूरी हो गई। अब आज्ञा दें। राजा ने कहा, ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई महापुरुष हमार दरबार से खाली हाथ लौट जाए? ऐसा कहते राजा ने अपने गले से हीर-मोती जड़ाऊ माला उतार कर उन्हें दे दी। दरवेश ने बाहर आकर दरबारियों से कहा देखो, इसे कहते हैं खुशामद। आज के एक ‘अजरुन’ ने भी ‘युवराज को तिलक’ का तीर यह सोच कर चलाया कि शबाशी मिलेगी, मगर उल्टा रोो गले पड़ गए। तीर निशाने पर नहीं बैठा, क्योंकि ‘निगाहें’ कहीं और थी, निशाना कहीं और।ड्ढr डॉ. आर. के मल्होत्रा, अलकनंदा, नई दिल्ली क्रिकेट से क्षेत्रवाद का विस्तार जिस तरह राज ठाकर महाराष्ट्र में क्षेत्रवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, उसी तरह आईपीएल और बीसीसीआई भी परोक्ष रूप से पूर भारत में क्षेत्रवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। आईपीएल ने पूर देश की संगठित जनता को अलग-अलग शहरों में बांटकर रख दिया है। इस आईपीएल के शुरू होने से पहले जो भारत एक था, अब वह अलग-अलग शहरों में बंटा-बंटा दिखाई देता है। कहीं ऐसा न हो कि यह आईपीएल लोगों की मानसिकता ही बदल दे।ड्ढr वैभव साहनी, मियांवाली नगर केवल बालिगों के लिएड्ढr आईपीएल या क्रिकेट या बीस ओवर के क्रिकेट से हमें कोई एतराज नहीं। लेकिन इसमें जिस तरह से अश्लीलता का प्रदर्शन हो रहा है वह आपत्तिजनजक है। अगर यही करना है तो इसे केवल बालिगों के लिए घोषित कर दीजिए। इसका प्रसारण लेट नाइट हो, जब बच्चे सो जाएं।ड्ढr नंदलाल कायस्थ, इंदिरापुरम, गाजियाबादड्ढr जेब कतरते उत्पादकड्ढr पैसे उतने ही, बढ़े हुए नहीं, पर सामान के वजन में अपनी-अपनी सुविधा से कमी। क्या यह उपभोक्ता की जेब कतरना नहीं? पिछले कुछ वर्षो से ब्रांडेड उत्पादक अपनी साख की आड़ लेकर, यही करते आ रहे हैं। वास्तव में तो वे केवल अपना हित साधने में लगे हैं। स्थानीय स्तर के भी उत्पादक ऐसा करके उन्हीं (ब्रांडेड उत्पादकों) का अनुसरण कर रहे हैं।ड्ढr एस. एस. अग्रवाल, दयालबाग, आगराड्ढr आटे-दाल की कीमत सही होड्ढr सरकार कह रही है कि गेहूं की फसल बंपर होगी। आपके मुंह में घी-शक्कर हुाूर। हालांकि ये दोनों भी काफी मंहगे हैं और अपने परिवार के लिए तो इन्हें अब खरीद पाना मुश्किल ही है। बस इतना कर दीजिए कि आटा दाल हमें सही कीमत पर मिलता रहे। वह चाहे आपकी इस बंपर फसल का हो, आस्ट्रेलिया का या फिर मंगल ग्रह का।ड्ढr फरदीन, बल्लीमारान, दिल्लीं

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